बिहारी मत कहो
अध्याय 1
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में बारिश की रात एक बच्चे का जन्म हुआ था।
उसकी माँ ने उसे सीने से लगाकर कहा,
“हमार बेटा बहुत बड़ा आदमी बनी…”
उस बच्चे का नाम रखा गया — कुशल ठाकुर।
लेकिन किस्मत ने उसके लिए बचपन से ही एक अलग रास्ता चुन रखा था।
कुशल अभी ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाया था कि उसके पिता रोज़गार की तलाश में राजस्थान आ गए। गांव में खेती से घर नहीं चल रहा था। इसलिए उन्होंने अपना छोटा सा घर छोड़ दिया और परिवार के साथ राजस्थान के एक शहर में आ बसे।
शुरुआत में सब नया था।
नई भाषा…
नए लोग…
नया माहौल…
लेकिन सबसे ज्यादा नया था लोगों का व्यवहार।
कुशल के पिता मेहनत मजदूरी करते थे। माँ घरों में सिलाई करती थीं। दोनों पूरे दिन मेहनत करते ताकि उनका बेटा अच्छी जिंदगी जी सके।
घर छोटा था, लेकिन उसमें प्यार बहुत था।
रात को खाना खाते समय पूरा परिवार भोजपुरी में बात करता।
“कुशल, पढ़ाई करs बेटा…”
“एतना शरारत मत कर…”
माँ की आवाज़ में अपनापन था।
लेकिन यही भाषा बाहर मज़ाक बन जाती थी।
जब कुशल पहली बार स्कूल गया, तब उसे कुछ समझ नहीं आता था। बच्चे राजस्थानी में बात करते और वह भोजपुरी में जवाब देता।
पूरा क्लास हँसने लगता।
“अरे ये कैसी भाषा बोल रहा है?”
“ए बिहारी…”
“भैया जी आया है…”
छोटा सा कुशल कुछ नहीं समझ पाता था।
वह घर आकर अपनी माँ से पूछता,
“मम्मी… बिहारी क्या होता है?”
उसकी माँ मुस्कुराकर कहती,
“बेटा, लोग ऐसे ही बोलते हैं। दिल छोटा मत कर।”
लेकिन धीरे-धीरे वह समझने लगा था कि लोग उसे अपने जैसा नहीं मानते।
एक दिन लंच टाइम में कुशल अपने घर से लाई हुई लिट्टी खा रहा था।
तभी एक लड़का बोला,
“देखो-देखो… ये तो गांव वाला खाना खा रहा है।”
सब बच्चे हँसने लगे।
कुशल ने चुपचाप अपना डिब्बा बंद कर दिया।
उस दिन उसने आधा खाना भी नहीं खाया।
धीरे-धीरे उसने बदलना शुरू कर दिया।
अब वह स्कूल में भोजपुरी बोलने से डरने लगा।
माँ अगर स्कूल के बाहर भोजपुरी में आवाज़ लगातीं, तो वह शर्म से इधर-उधर देखने लगता।
उसे लगने लगा था कि उसकी असली पहचान ही उसकी कमजोरी है।
पाँचवीं क्लास तक पहुँचते-पहुँचते कुशल बिल्कुल शांत हो चुका था।
अब वह ज्यादा दोस्त नहीं बनाता था।
क्लास में पीछे बैठता।
कम बोलता।
और हमेशा यही कोशिश करता कि कोई उससे उसके बारे में सवाल ना पूछे।
लेकिन लोग फिर भी पूछते।
“कहाँ से है तू?”
“यूपी से…”
बस इतना सुनना होता और सामने वाला हँस देता।
उस दिन पहली बार कुशल ने झूठ बोला।
उसने कहा,
“नहीं… मैं तो राजस्थान का हूँ।”
और सामने वाला मान गया।
उस छोटे से झूठ ने उसे कुछ सेकंड की राहत दी।
उसी रात वह देर तक छत पर बैठा रहा।
उसे लग रहा था जैसे उसने खुद को धोखा दिया हो।
लेकिन दूसरी तरफ उसे पहली बार मज़ाक से बचने का रास्ता भी मिल गया था।
धीरे-धीरे झूठ उसकी आदत बनने लगा।
अब अगर कोई पूछता —
“घर कहाँ है?”
तो वह कहता —
“यहीं राजस्थान में।”
अगर कोई भाषा पूछता —
“मारवाड़ी थोड़ी-बहुत आती है।”
वह खुद को बदलने लगा था।
सिर्फ इसलिए…
ताकि लोग उसे अपनाएँ।
लेकिन अंदर कहीं एक छोटा सा बच्चा अब भी रोता था।
जो सिर्फ इतना चाहता था कि कोई उसे “बिहारी” नहीं…
“कुशल” कहकर बुलाए।
अध्याय 2
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
अब कुशल आठवीं क्लास में पहुँच चुका था।
चेहरे पर मासूमियत अभी भी थी, लेकिन आँखों में बचपन वाली चमक कम होने लगी थी। वह अब हर बात बहुत सोच-समझकर करता था।
स्कूल जाते वक्त वह रास्ते भर यही सोचता रहता —
“आज कोई बिहारी मत बोल देना…”
क्योंकि यह एक शब्द अब मज़ाक नहीं रहा था।
धीरे-धीरे वह उसके आत्मविश्वास को खा रहा था।
कुशल पढ़ाई में अच्छा था।
हर परीक्षा में अच्छे नंबर लाता।
टीचर उसकी तारीफ़ भी करते।
लेकिन क्लास के बच्चों को उसकी मेहनत नहीं दिखती थी।
उन्हें बस उसकी भाषा दिखती थी।
उसका अलग होना दिखता था।
एक दिन हिंदी पीरियड में टीचर ने सभी बच्चों से अपनी मातृभाषा में दो लाइन बोलने को कहा।
कोई मारवाड़ी बोला।
कोई मेवाड़ी।
फिर कुशल की बारी आई।
पूरा क्लास उसे देखने लगा।
उसके हाथ काँपने लगे।
टीचर ने मुस्कुराकर कहा,
“डरो मत बेटा, अपनी भाषा में बोलो।”
कुशल खड़ा हुआ…
लेकिन उसके मुँह से भोजपुरी का एक शब्द भी नहीं निकला।
कुछ सेकंड चुप रहने के बाद उसने धीरे से कहा,
“मुझे नहीं आती…”
जबकि वही भाषा उसके घर की पहचान थी।
उस दिन घर लौटते समय वह पूरे रास्ते चुप रहा।
रात को उसकी माँ ने पूछा,
“का भईल बेटा? इतना चुप काहे बा?”
कुशल झुंझलाकर बोला,
“मम्मी… स्कूल में भोजपुरी मत बोला करो।”
उसकी माँ कुछ सेकंड उसे देखती रह गईं।
उनकी आँखों में हल्की चोट साफ दिखाई दे रही थी।
लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुराकर खाना परोस दिया।
उस रात कुशल देर तक सो नहीं पाया।
उसे एहसास था कि उसने अपनी माँ का दिल दुखाया है।
लेकिन डर उससे भी बड़ा हो चुका था।
अब उसने खुद को पूरी तरह बदलने की ठान ली।
उसने भोजपुरी गाने सुनना बंद कर दिया।
घर के बाहर अपने नाम का उच्चारण भी बदल लिया।
“कुशल ठाकुर” अब “Kush” बनने लगा था।
उसे लगता था कि अंग्रेज़ी बोलने और राजस्थानी अंदाज़ अपनाने से लोग उसे स्वीकार कर लेंगे।
धीरे-धीरे उसने अपना नकली रूप बना लिया।
स्कूल में वह मारवाड़ी शब्द इस्तेमाल करता।
घर की बातें किसी को नहीं बताता।
यहाँ तक कि दोस्तों को कभी घर भी नहीं बुलाता।
क्योंकि उसे डर था…
कहीं सच बाहर ना आ जाए।
दसवीं क्लास तक आते-आते कुशल अंदर से दो हिस्सों में बँट चुका था।
एक वो…
जो घर में माँ के हाथ की लिट्टी खाकर खुश होता था।
और दूसरा वो…
जो बाहर जाकर उन्हीं चीज़ों को छुपाता था।
एक दिन उसके पिता काम से लौटे।
बहुत थके हुए थे।
उन्होंने प्यार से कहा,
“बेटा, तू बड़ा आदमी बनेगा… बस अपनी पहचान कभी मत भूलना।”
कुशल हल्का मुस्कुराया।
लेकिन अंदर ही अंदर उसने सोचा —
“पहचान ही तो मेरी सबसे बड़ी परेशानी है…”
उस रात पहली बार उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद से कहा,
“अब किसी को सच नहीं पता चलेगा।”
और शायद…
उसी दिन उसके अंदर झूठ ने हमेशा के लिए घर बना लिया।
अध्याय 3
स्कूल खत्म होने के बाद कुशल ने शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में एडमिशन लिया।
नई जगह…
नए लोग…
नई शुरुआत…
लेकिन एक चीज़ अब भी पुरानी थी।
उसका डर।
कॉलेज में कदम रखते ही उसने मन ही मन फैसला कर लिया था —
“यहाँ कोई मेरा सच नहीं जानेगा।”
अब वह पहले से ज्यादा बदल चुका था।
उसका पहनावा बदल गया था।
बोलने का तरीका बदल गया था।
यहाँ तक कि उसने अपनी भोजपुरी लहजे को भी दबाना सीख लिया था।
अगर कभी गलती से कोई शब्द निकल जाता, तो वह तुरंत बात बदल देता।
कॉलेज में ज्यादातर बच्चे अमीर परिवारों से थे।
सबको अपनी पहचान पर गर्व था।
कोई कहता —
“हम राजपूत हैं।”
कोई कहता —
“हम जयपुर के पुराने परिवार से हैं।”
और जब कोई कुशल से पूछता,
“तू कहाँ से है?”
तो वह बिना रुके मुस्कुराकर कहता,
“राजस्थान।”
अब यह झूठ उसके चेहरे पर बिल्कुल सच जैसा दिखने लगा था।
फिर एक दिन…
कॉलेज की लाइब्रेरी में उसकी मुलाकात जैसमिन से हुई।
सफेद कुर्ती…
खुली बाल…
और आँखों में अजीब सी शांति।
वह बाकी लड़कियों जैसी नहीं थी।
ना ज़्यादा दिखावा।
ना नकली attitude।
वह पहली लड़की थी जिसने कुशल से उसकी जाति या शहर पूछने से पहले यह पूछा —
“तुम हमेशा इतने चुप क्यों रहते हो?”
कुशल कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
फिर हल्का सा मुस्कुराकर बोला,
“आदत है।”
जैसमिन हँस पड़ी।
उसकी हँसी में कुछ ऐसा था जो कुशल को अंदर तक सुकून दे गया।
धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं।
पहले सिर्फ लाइब्रेरी तक…
फिर कैंटीन तक…
और फिर घंटों फोन कॉल तक।
कुशल अब पहली बार किसी के साथ खुद को अच्छा महसूस करने लगा था।
जैसमिन उसके शांत स्वभाव को पसंद करती थी।
उसे लगता था कि कुशल बाकी लड़कों से अलग है।
लेकिन कुशल के अंदर अभी भी एक डर जिंदा था।
उसे हमेशा लगता —
“अगर जैसमिन को मेरा सच पता चल गया तो?”
इसलिए उसने फिर झूठ बोलना शुरू किया।
“हम लोग तो पीढ़ियों से राजस्थान में हैं।”
“घर में राजस्थानी ही बोलते हैं।”
“पापा का अपना बिज़नेस है।”
हर झूठ के साथ उसका दिल थोड़ा और भारी हो जाता।
लेकिन प्यार इंसान को कमजोर बना देता है।
और कुशल अब जैसमिन को खोने से डरने लगा था।
एक दिन कॉलेज में cultural fest था।
सब traditional कपड़ों में आए थे।
जैसमिन राजपूती ड्रेस में बेहद खूबसूरत लग रही थी।
कुशल उसे बस देखता रह गया।
जैसमिन मुस्कुराकर उसके पास आई और बोली,
“क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो?”
कुशल धीरे से बोला,
“तुम बहुत सुंदर लग रही हो…”
जैसमिन पहली बार उसके सामने शर्माई थी।
उस दिन दोनों ने पूरा कॉलेज साथ घूमकर बिताया।
शाम को कॉलेज की छत पर खड़े होकर जैसमिन ने अचानक पूछा —
“कुशल… तुम मुझसे कुछ छुपाते तो नहीं ना?”
यह सुनते ही उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
कुछ सेकंड तक वह चुप रहा।
फिर जबरदस्ती मुस्कुराकर बोला,
“नहीं तो…”
लेकिन उसकी आँखें सच बोल रही थीं।
जैसमिन ने शायद महसूस भी किया।
लेकिन उसने उस दिन ज्यादा कुछ नहीं पूछा।
क्योंकि उसे कुशल पर भरोसा था।
और यही भरोसा…
आने वाले समय में टूटने वाला था।
अध्याय 4
अब कुशल और जैसमिन का रिश्ता पूरे कॉलेज में चर्चा का विषय बनने लगा था।
दोनों हमेशा साथ दिखाई देते।
क्लास खत्म होने के बाद कैंटीन…
कभी लाइब्रेरी…
तो कभी शहर की शांत गलियों में लंबी बातें।
कुशल अब सच में खुश रहने लगा था।
उसे पहली बार लग रहा था कि शायद जिंदगी बदल सकती है।
लेकिन हर खुशी के पीछे उसका एक डर हमेशा खड़ा रहता था।
“अगर जैसमिन को सच पता चल गया तो?”
यह सवाल उसे अंदर ही अंदर खाता रहता।
एक दिन जैसमिन ने अचानक कहा,
“मैं तुम्हारे घरवालों से मिलना चाहती हूँ।”
यह सुनते ही कुशल जैसे अंदर से जम गया।
उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
“अभी… अभी क्यों?” उसने हिचकिचाते हुए पूछा।
जैसमिन हँसकर बोली,
“क्योंकि मैं तुम्हें पसंद करती हूँ… और शायद तुम्हारे घरवालों को भी जानना चाहती हूँ।”
कुशल ने तुरंत बात बदलने की कोशिश की।
“घर छोटा है…”
“मम्मी की तबीयत ठीक नहीं…”
“फिर कभी…”
लेकिन इस बार जैसमिन नहीं मानी।
“तुम हमेशा अपने घर की बात आते ही घबरा क्यों जाते हो?” उसने सीधे पूछा।
कुशल के पास कोई जवाब नहीं था।
आखिरकार उसने हाँ बोल दिया।
पूरा रास्ता वह चुप था।
उसके हाथ पसीने से भीग रहे थे।
उसे लग रहा था जैसे वह खुद अपने बनाए झूठ के जाल में फँस चुका है।
घर के बाहर पहुँचकर वह कुछ सेकंड रुका।
जैसमिन ने मुस्कुराकर कहा,
“इतना nervous क्यों हो?”
कुशल बस हल्का सा मुस्कुरा दिया।
फिर उसने दरवाज़ा खोला।
अंदर से उसकी माँ की आवाज़ आई —
“कुशल बेटा, बाजार से दही ले अइला का?”
जैसमिन के कदम वहीं रुक गए।
उसने पहली बार कुशल को ध्यान से देखा।
फिर अंदर से उसके पिता आए और बोले —
“अरे बेटा, मेहमान आइल बाड़ी का? अंदर बुलावा ना…”
पूरा घर भोजपुरी से गूंज रहा था।
दीवारों पर गाँव की तस्वीरें लगी थीं।
रसोई से लिट्टी-चोखा की खुशबू आ रही थी।
और कुशल…
वह सिर झुकाकर खड़ा था।
जैसमिन कुछ सेकंड तक बिल्कुल चुप रही।
फिर धीरे से बोली,
“तुमने कहा था… तुम लोग राजस्थान से हो।”
कुशल के होंठ काँपने लगे।
“मैं… मैं बताना चाहता था…”
“लेकिन बताया नहीं।” जैसमिन ने उसकी बात काट दी।
उसकी आँखों में गुस्से से ज्यादा दुख था।
“तुम्हें पता है सबसे ज्यादा दर्द किस बात का हुआ?”
कुशल चुप रहा।
जैसमिन की आवाज़ भर्रा गई —
“तुम्हें अपनी पहचान पर भरोसा नहीं था… और मुझे तुम पर।”
इतना कहकर वह बाहर चली गई।
कुशल उसे रोक भी नहीं पाया।
उस दिन पहली बार उसे अपना घर छोटा नहीं लगा…
बल्कि खुद की सोच छोटी लगी।
रातभर उसने जैसमिन को कॉल किए।
मैसेज किए।
लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
वह छत पर बैठा पूरी रात खुद को कोसता रहा।
नीचे कमरे में उसके माता-पिता चुप बैठे थे।
उनकी आँखों में भी दर्द था।
क्योंकि आज पहली बार उन्होंने अपने बेटे को अपनी पहचान से शर्माते हुए साफ देखा था।
सुबह उसके पिता उसके पास आए।
उन्होंने धीरे से कहा,
“बेटा… गरीब होना शर्म की बात नहीं है।”
कुशल की आँखें भर आईं।
पिता आगे बोले,
“लेकिन अपने माँ-बाप और अपनी मिट्टी से शर्माना… आदमी को अंदर से खोखला कर देता है।”
यह सुनकर कुशल टूट गया।
वह अपने पिता के गले लगकर रो पड़ा।
शायद कई सालों का दर्द पहली बार बाहर निकला था।
लेकिन दूसरी तरफ…
जैसमिन का भरोसा अब टूट चुका था।
अध्याय 5
जैसमिन को गए हुए पूरे पाँच दिन हो चुके थे।
कॉलेज वही था…
क्लास वही थी…
लोग वही थे…
लेकिन कुशल की दुनिया बदल चुकी थी।
अब वह पहले जैसा नहीं रहा था।
जिस कैंटीन में वह जैसमिन के साथ घंटों बैठता था, अब वहाँ अकेला बैठा रहता।
लाइब्रेरी की वही सीट अब खाली लगती।
फोन की स्क्रीन हर कुछ मिनट में जलती…
लेकिन जैसमिन का कोई मैसेज नहीं आता।
धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा था कि उसने सिर्फ एक लड़की से झूठ नहीं बोला…
उसने खुद से भी झूठ बोला था।
उस रात वह अपने कमरे में बैठा पुरानी तस्वीरें देख रहा था।
एक तस्वीर में उसका छोटा सा बचपन था।
मिट्टी में खेलता हुआ…
माँ के हाथ की लिट्टी खाते हुए…
पिता के कंधे पर बैठा मुस्कुराता हुआ।
उसने तस्वीर को देर तक देखा।
फिर धीरे से खुद से बोला,
“मैं आखिर किस चीज़ से भाग रहा था?”
अगले दिन कॉलेज में कुछ लड़के फिर मज़ाक कर रहे थे।
“सुना है भाई यूपी वाला निकला…”
“अरे राजस्थानी बन रहा था…”
पहले वाला कुशल शायद चुप हो जाता।
लेकिन इस बार वह रुका।
उसने पहली बार बिना डरे कहा —
“हाँ… यूपी से हूँ।”
पूरा ग्रुप कुछ सेकंड चुप हो गया।
कुशल आगे बोला,
“और मेरे माँ-बाप मेहनत करके मुझे यहाँ तक लाए हैं… इसमें शर्म की क्या बात है?”
उसकी आवाज़ में पहली बार डर नहीं था।
कॉलेज के कई बच्चे उसे हैरानी से देखने लगे।
क्योंकि आज पहली बार कुशल नकली नहीं लग रहा था।
उस शाम वह सीधे जैसमिन के घर गया।
दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
दरवाज़ा जैसमिन ने खोला।
दोनों कुछ सेकंड तक बस एक-दूसरे को देखते रहे।
जैसमिन की आँखों में अब भी नाराज़गी थी।
कुशल ने धीरे से कहा,
“मुझे तुमसे बात करनी है।”
जैसमिन बिना कुछ बोले बाहर आ गई।
घर के सामने हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी।
कुछ देर दोनों चुप खड़े रहे।
फिर कुशल बोला —
“मैंने तुमसे झूठ बोला… क्योंकि मैं डरता था।”
जैसमिन चुप रही।
“बचपन से लोग बिहारी बोलकर हँसते थे… मुझे लगता था अगर किसी ने सच जान लिया तो वो मुझे छोड़ देगा।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“फिर तुम मिली… और पहली बार लगा कोई मुझे पसंद कर सकता है।”
जैसमिन की आँखें धीरे-धीरे नरम होने लगीं।
कुशल आगे बोला —
“लेकिन तुम्हें पाने के चक्कर में मैं खुद को खोता चला गया।”
बारिश अब तेज हो चुकी थी।
कुशल ने सिर झुकाकर कहा,
“अगर तुम मुझे छोड़ना चाहो तो मैं रोकूँगा नहीं… लेकिन आज पहली बार मैं सच बोल रहा हूँ।”
कुछ सेकंड तक सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई देती रही।
फिर जैसमिन धीरे से उसके पास आई।
उसने कहा,
“गलती तुम्हारे यूपी से होने की नहीं थी…”
कुशल ने उसकी तरफ देखा।
जैसमिन की आँखों में आँसू थे।
“गलती अपनी पहचान छुपाने की थी।”
वह आगे बोली —
“रिश्ते झूठ से नहीं चलते कुशल… भरोसे से चलते हैं।”
कुशल की आँखें भर आईं।
जैसमिन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“और इंसान छोटा उसकी भाषा या जगह से नहीं होता… सोच से होता है।”
यह सुनकर कुशल के अंदर जैसे सालों से जमा बोझ टूट गया।
उसने पहली बार बिना शर्म के कहा —
“हम यूपी से हैं… और घर में भोजपुरी बोलते हैं।”
जैसमिन हल्का सा हँस पड़ी।
“अच्छा है… मुझे भी सिखाना।”
उस पल कुशल को पहली बार अपनी पहचान बोझ नहीं लगी…
अपनापन लगी।
अध्याय 6
समय धीरे-धीरे फिर सामान्य होने लगा।
लेकिन इस बार कुशल बदल चुका था।
अब वह खुद को छुपाता नहीं था।
कॉलेज में अगर कोई पूछता,
“कहाँ से हो?”
तो वह मुस्कुराकर कहता,
“असल में यूपी से… लेकिन बचपन राजस्थान में बीता है।”
और सबसे खास बात…
अब उसे यह कहते हुए शर्म नहीं आती थी।
जैसमिन भी उसके साथ पहले से ज्यादा खुलकर रहने लगी थी।
वह कभी-कभी मज़ाक में भोजपुरी सीखने की कोशिश करती।
“का हाल बा?” बोलते ही खुद ही हँस पड़ती।
और कुशल…
वह उसे बस देखता रह जाता।
उसे पहली बार लग रहा था कि शायद सच्चा प्यार वही होता है…
जहाँ इंसान को बदलना ना पड़े।
कॉलेज खत्म होते-होते दोनों का रिश्ता बहुत मजबूत हो चुका था।
अब दोनों परिवार भी एक-दूसरे को जानने लगे थे।
शुरुआत में जैसमिन के घरवालों को थोड़ा अजीब लगा।
क्योंकि समाज हमेशा “अपने” और “बाहर वाले” का फर्क करता आया है।
लेकिन कुशल के व्यवहार ने धीरे-धीरे सबका दिल जीत लिया।
उसके पिता का सम्मान…
माँ की सादगी…
और कुशल की ईमानदारी…
इन सबने लोगों की सोच बदलनी शुरू कर दी।
एक दिन जैसमिन के पिता ने कुशल को बुलाकर पूछा,
“अगर इतना डर था… तो सच बताया क्यों?”
कुशल हल्का मुस्कुराया।
“क्योंकि अब मैं थक गया था खुद से भागते-भागते।”
उस जवाब में सालों का दर्द छुपा था।
कुछ महीनों बाद…
दोनों की शादी तय हो गई।
शादी बहुत बड़ी नहीं थी…
लेकिन खूबसूरत थी।
राजस्थानी गाने भी बजे…
और भोजपुरी भी।
एक तरफ दाल-बाटी थी…
तो दूसरी तरफ लिट्टी-चोखा।
दो संस्कृतियाँ पहली बार लड़ नहीं रही थीं…
एक-दूसरे को अपना रही थीं।
मंडप में बैठा कुशल बार-बार अपने माता-पिता को देख रहा था।
उसकी माँ की आँखों में आँसू थे।
पिता बस चुपचाप मुस्कुरा रहे थे।
शायद उन्हें पहली बार लगा था कि उनका बेटा अब खुद से शर्मिंदा नहीं है।
फेरे लेते समय जैसमिन ने धीरे से कुशल से कहा,
“अब कभी खुद को छुपाना मत…”
कुशल मुस्कुराया और बोला,
“अब जरूरत नहीं पड़ेगी।”
शादी के बाद दोनों एक छोटे से घर में रहने लगे।
जहाँ कभी राजस्थानी बोली सुनाई देती…
तो कभी भोजपुरी।
लेकिन अब उन भाषाओं में फर्क नहीं था।
क्योंकि उस घर में सबसे बड़ी भाषा —
प्यार और अपनापन बन चुकी थी।
धीरे-धीरे कुशल ने अपने जैसे कई बच्चों की मदद करनी शुरू की।
वह स्कूलों में जाकर बच्चों से बात करता।
उन्हें समझाता कि किसी की भाषा, राज्य या खान-पान उसका मज़ाक बनाने की चीज़ नहीं होती।
क्योंकि इंसान की पहचान उसकी मेहनत और दिल से होती है…
जन्म की जगह से नहीं।
एक दिन उसी स्कूल में, जहाँ कभी उसे “बिहारी” कहकर चिढ़ाया जाता था…
एक छोटा बच्चा उसके पास आया और बोला,
“भैया… मैं भी यूपी से हूँ।”
कुशल मुस्कुराया।
उसने बच्चे के कंधे पर हाथ रखा और कहा,
“कभी खुद को छोटा मत समझना।”
उस दिन शायद कुशल ने सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं जीती थी…
बल्कि अपने बचपन के उस डरे हुए बच्चे को भी जीत लिया था,
जो बस अपनापन चाहता था।
────────────────────
सच्चाई यही है कि भारत के कई राज्यों में आज भी दूसरे राज्य से आए लोगों को उनके नाम, भाषा, खान-पान या लहजे की वजह से छोटा महसूस कराया जाता है। खासकर बिहार, यूपी, उत्तर-पूर्व (North East) और दूसरे राज्यों के लोगों को कई जगह मज़ाक, भेदभाव और तानों का सामना करना पड़ता है। जबकि भारत की असली ताकत उसकी अलग-अलग संस्कृतियाँ और भाषाएँ हैं। कोई भाषा छोटी नहीं होती… और ना ही कोई इंसान अपने राज्य की वजह से छोटा होता है।
