जिसे अपना समझा

 

जिसे अपना समझा – दर्दभरी प्रेम कहानी

अध्याय 1  

“कुछ लड़कियाँ प्यार में नहीं पड़तीं…  

वो बस पहली बार किसी अपने जैसा इंसान देख लेती हैं।”  


सुबह के पाँच बजे थे।  

पूरे मोहल्ले में अभी अंधेरा फैला हुआ था, लेकिन कशिश की आँखें खुल चुकी थीं।  

उसकी नींद अलार्म से नहीं, बल्कि उसकी माँ की आवाज़ से खुलती थी।


“कशिश… उठ जा। पानी भरना है। फिर स्कूल भी जाना है।”


कशिश धीरे से बिस्तर से उठी।  

कमरे की दीवारें जगह-जगह से टूटी हुई थीं। छत का पंखा आवाज़ करते हुए घूम रहा था। एक कोने में उसका छोटा भाई गहरी नींद में सो रहा था और दूसरे कोने में उसके पिता नशे में बेसुध पड़े थे।


कमरे में शराब की बदबू फैली हुई थी।


कशिश ने बिना कुछ बोले अपना दुपट्टा उठाया और बाहर निकल गई।


गली में ठंडी हवा चल रही थी। हाथ में दो बड़ी बाल्टियाँ लेकर वह मोहल्ले के नल की तरफ बढ़ने लगी। वहाँ पहले से कई औरतें खड़ी थीं। कुछ बातें कर रही थीं, कुछ लड़ रही थीं।


“आज फिर देर हो गई तुझे।”  

एक औरत ने ताना मारते हुए कहा।


कशिश बस हल्का सा मुस्कुरा दी।  

उसे आदत थी।


वो हर दिन ताने सुनती थी।  

कभी कपड़ों पर।  

कभी घर की हालत पर।  

कभी अपने पिता पर।


लेकिन सबसे ज़्यादा दर्द तब होता था जब लोग उसकी माँ को कहते—


“लड़की जवान हो रही है… संभालकर रखा करो।”


जैसे वो कोई इंसान नहीं, बल्कि घर का बोझ हो।


पानी भरने के बाद वह घर लौटी।  

माँ रसोई में सूखी रोटियाँ सेंक रही थी।


“ये ले… तेरे लिए।”


कशिश ने प्लेट देखी।  

दो सूखी रोटियाँ और थोड़ा सा नमक।


उसने बिना शिकायत किए खाना शुरू कर दिया।


तभी उसके पिता की आवाज़ आई—


“चाय कहाँ है मेरी?”


उनकी आँखें लाल थीं।  

चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।


माँ जल्दी-जल्दी चाय बनाने लगी।


लेकिन जैसे ही चाय का कप उनके हाथ में गया, उन्होंने गुस्से में कप फेंक दिया।


“ठंडी है ये!”


कप सीधे दीवार से टकराया।  

चाय ज़मीन पर फैल गई।


कशिश डरकर पीछे हट गई।  

उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।


ये सब उसके लिए नया नहीं था।


हर दूसरे दिन घर में यही होता था।  

कभी चीखें।  

कभी गालियाँ।  

कभी चीज़ें टूटने की आवाज़ें।


उसकी माँ चुप रहती थी।  

और कशिश…  

वो भी धीरे-धीरे चुप रहना सीख गई थी।


कुछ देर बाद वह स्कूल जाने लगी।


उसका स्कूल घर से काफी दूर था।  

वो रोज़ पैदल जाती थी।


रास्ते में उसने कई लड़कियों को देखा जो हँसते हुए जा रही थीं।  

उनके चेहरे हल्के थे।  

जिंदगी आसान लग रही थी।


कशिश उन्हें देखती और मन ही मन सोचती—


“क्या सबके घर ऐसे ही होते हैं… या सिर्फ मेरा घर अलग है?”


स्कूल पहुँचते ही उसने अपनी पुरानी किताबें मेज़ पर रखीं।


तभी पीछे से एक आवाज़ आई—


“तुम्हारा कल वाला पेन फिर बंद हो गया क्या?”


कशिश ने पलटकर देखा।


वो संयम था।


उसकी आँखों में हमेशा जैसी नरमी थी।


वह धीरे से मुस्कुराया और अपनी जेब से नया पेन निकालकर उसकी तरफ बढ़ा दिया।


“मैं एक अतिरिक्त पेन लाया था… तुम्हारे लिए।”


कशिश कुछ पल उसे देखती रही।


दुनिया में शायद पहली बार किसी ने उसके लिए बिना मतलब कुछ रखा था।


उसने धीरे से पेन लिया।


“धन्यवाद…”


संयम बस मुस्कुराकर अपनी जगह बैठ गया।


कक्षा शुरू हुई।


अध्यापक सवाल पूछ रहे थे और आज फिर संयम सबसे आगे बैठा था।  

पहले वो इतना पढ़ने वाला लड़का नहीं था।  

लेकिन पिछले कुछ महीनों से वो बदल गया था।


अब वो रोज़ पढ़ता था।  

हर सवाल का जवाब देता था।  

और जब भी कोई कशिश का मज़ाक उड़ाता… वो सबसे पहले उसके सामने खड़ा हो जाता।


कशिश समझ नहीं पा रही थी कि कोई उसके लिए इतना क्यों करता है।


उसने कभी अपने घर में ऐसा अपनापन महसूस नहीं किया था।


ना पिता से।  

ना रिश्तेदारों से।  

ना दुनिया से।


लेकिन इस लड़के की छोटी-छोटी बातें उसके दिल में जगह बनाने लगी थीं।


दोपहर में जब सब बच्चे खाना खा रहे थे, कशिश अकेली बैठी थी।


उसके पास खाने को कुछ नहीं था।


तभी संयम उसके पास आकर बैठ गया।


उसने बिना कुछ कहे अपना डिब्बा उसकी तरफ बढ़ा दिया।


“इतना भी बुरा नहीं बना आज माँ ने।”


कशिश ने उसकी तरफ देखा।


उसकी आँखों में आँसू आने लगे थे…  

लेकिन उसने जल्दी से चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।


क्योंकि कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान छुपाना सीख जाता है।


और शायद…


कशिश पहली बार किसी ऐसे इंसान से मिल रही थी जो उसके अंदर छुपे दर्द को बिना बोले पढ़ लेता था।


अध्याय 2  

“जिस इंसान को घर में कभी अपनापन नहीं मिलता…  

वो बाहर मिलने वाली छोटी सी परवाह को भी मोहब्बत समझ बैठता है।”  


दिन धीरे-धीरे बीतने लगे।


अब कशिश की सुबहें पहले जैसी ही होती थीं—  

वही ताने…  

वही काम…  

वही घर का दम घोंट देने वाला माहौल…


लेकिन अब उसकी जिंदगी में एक चीज़ बदल गई थी।


स्कूल।


पहले स्कूल उसके लिए बस पढ़ाई की जगह था।  

जहाँ वो चुपचाप जाती… आखिरी बेंच पर बैठती… और छुट्टी होते ही वापस घर आ जाती।


लेकिन अब…


अब उसे सुबह होने का इंतज़ार रहने लगा था।


क्योंकि वहाँ कोई था…  

जो उसे देखकर मुस्कुराता था।


संयम।


उसने कभी सीधे मुँह “मैं तुम्हें चाहता हूँ” नहीं कहा था।  

लेकिन उसकी हर छोटी हरकत यही कहती थी।


अगर कशिश देर से आती…  

तो वो बाहर खड़ा उसका इंतज़ार करता।


अगर अध्यापक डाँट देते…  

तो वो बात बदलने की कोशिश करता।


अगर कोई लड़का उसका मज़ाक उड़ाता…  

तो सबसे पहले संयम ही उसके सामने खड़ा होता।


धीरे-धीरे पूरी कक्षा को समझ आने लगा था कि संयम, कशिश को बाकी सब लड़कियों से अलग मानता है।


लेकिन कशिश…


वो अभी भी इस एहसास को समझने की कोशिश कर रही थी।


उसे बस इतना महसूस होता था कि जब वो संयम के पास होती है…  

तो उसका डर थोड़ा कम हो जाता है।


एक दिन की बात थी।


बारिश का मौसम शुरू हो चुका था।  

स्कूल की छुट्टी हुई तो बाहर तेज़ बारिश हो रही थी।


बच्चे भागते हुए घर जा रहे थे।


कशिश बरामदे में खड़ी थी।  

उसके पास छाता नहीं था।


वो सोच रही थी कि भीगकर घर पहुँचेगी तो माँ कुछ नहीं कहेगी…  

लेकिन पिता अगर घर पर हुए, तो फिर लड़ाई होगी।


तभी उसके सिर पर किसी ने छाता कर दिया।


संयम था।


“चलो… मैं छोड़ देता हूँ।”


“नहीं… लोग देखेंगे।”


“लोग तो वैसे भी कुछ ना कुछ बोलते ही हैं।”


कशिश चुप हो गई।


दोनों एक ही छाते के नीचे धीरे-धीरे चलने लगे।


बारिश की बूंदें सड़क पर गिर रही थीं।  

हवा ठंडी थी।  

लेकिन कशिश के अंदर पहली बार अजीब सी गर्माहट महसूस हो रही थी।


रास्ते भर संयम छोटी-छोटी बातें करता रहा।


“तुम्हें गणित से इतना डर क्यों लगता है?”


“क्योंकि मुझे कुछ समझ नहीं आता।”


“तो मैं समझा दिया करूँगा।”


“तुम हर चीज़ क्यों करते हो मेरे लिए?”


संयम कुछ पल चुप रहा।


फिर हल्का सा मुस्कुराया।


“अच्छा लगता है।”


बस इतना ही कहा उसने।


लेकिन उस छोटे से जवाब ने कशिश के दिल में बहुत कुछ बदल दिया।


घर पहुँचते-पहुँचते बारिश और तेज़ हो गई थी।


कशिश दरवाज़े तक पहुँची ही थी कि अंदर से पिता की चीखने की आवाज़ आई।


“कहाँ मर गई थी तू?”


कशिश डर गई।


उसके हाथ काँपने लगे।


संयम ने पहली बार उसके चेहरे पर वो डर इतने करीब से देखा था।


अंदर से बर्तनों के टूटने की आवाज़ें आ रही थीं।


माँ रो रही थी।


कशिश जल्दी से अंदर जाने लगी।


लेकिन तभी संयम ने उसका हाथ पकड़ लिया।


बहुत हल्के से।


“सब ठीक हो जाएगा।”


ये शब्द बहुत साधारण थे…


लेकिन कशिश के लिए नहीं।


क्योंकि उसकी जिंदगी में आज तक किसी ने उससे ये नहीं कहा था।


उस रात घर में फिर बहुत लड़ाई हुई।


पिता नशे में थे।  

उन्होंने माँ पर हाथ उठाया।


कशिश बीच में आई…  

तो उसे भी धक्का दे दिया गया।


वो दीवार से टकराकर नीचे गिर गई।


उसकी आँखों में आँसू थे…  

लेकिन आवाज़ नहीं।


क्योंकि रोने की भी आदत छूट चुकी थी।


रात को सबके सो जाने के बाद वो छत पर जाकर बैठ गई।


आसमान में बादल थे।  

हवा तेज़ चल रही थी।


वो चुपचाप घुटनों में चेहरा छुपाकर बैठी रही।


और फिर…


उसने अपने हाथ में वो पेन देखा…  

जो संयम ने उसे दिया था।


उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे उस पेन को छूने लगीं।


और ना जाने क्यों…


उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।


शायद इसलिए नहीं कि वो दुखी थी…


बल्कि इसलिए कि पहली बार उसे महसूस हुआ था—


कि इस दुनिया में कोई ऐसा भी है…  

जिसे उसके टूटने से फर्क पड़ता है।

अध्याय 3  

“कुछ लोग हमारी जिंदगी में प्यार बनकर नहीं आते…  

वो पहले हमारी आदत बनते हैं।”  


अगले दिन कशिश स्कूल तो आई…  

लेकिन आज वो पहले जैसी नहीं लग रही थी।


उसकी आँखों के नीचे हल्के काले निशान थे।  

चेहरा बुझा हुआ था।  

और सबसे अलग बात—


आज उसने संयम की तरफ एक बार भी नहीं देखा।


संयम दूर से उसे देख रहा था।


उसे तुरंत समझ आ गया था कि कुछ हुआ है।


कक्षा में अध्यापक पढ़ा रहे थे, लेकिन कशिश कहीं खोई हुई थी।  

उसकी उंगलियाँ बस कॉपी के कोने पर कुछ बनाती जा रही थीं।


संयम ने धीरे से उसकी तरफ एक कागज़ बढ़ाया।


“क्या हुआ?”


कशिश ने कागज़ देखा…  

लेकिन कोई जवाब नहीं दिया।


उसने कागज़ मोड़कर बैग में रख लिया।


पहली बार ऐसा हुआ था कि उसने संयम की बात अनसुनी कर दी थी।


पूरा दिन ऐसे ही निकल गया।


ना उसने मुस्कुराया।  

ना कुछ बोली।  

ना खाना खाया।


संयम बार-बार उसे देखता रहा।


उसे बेचैनी होने लगी थी।


छुट्टी हुई तो बाकी बच्चे बाहर निकलने लगे।


लेकिन कशिश अपनी जगह पर बैठी रही।


उसकी आँखें खाली लग रही थीं।


संयम धीरे से उसके पास आया।


“कशिश…”


कोई जवाब नहीं।


“अगर मैंने कुछ गलत किया है तो बता दो।”


अब भी चुप्पी।


कुछ पल बाद कशिश अचानक उठी और तेज़ कदमों से कक्षा से बाहर निकल गई।


संयम भी उसके पीछे चला गया।


स्कूल के पीछे एक पुराना मैदान था जहाँ ज़्यादा लोग नहीं आते थे।


कशिश वहीं जाकर रुक गई।


उसकी पीठ संयम की तरफ थी।


हवा धीरे-धीरे चल रही थी।


कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।


फिर संयम ने धीमी आवाज़ में पूछा—


“क्या हुआ है?”


बस इतना सुनना था…


कशिश टूट गई।


उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।


वो जल्दी-जल्दी उन्हें पोंछने लगी, जैसे रोना कोई गलती हो।


“कुछ नहीं…”


उसकी आवाज़ काँप रही थी।


संयम उसके थोड़ा पास आया।


“मुझसे झूठ मत बोलो।”


कशिश ने पहली बार उसकी तरफ देखा।


उसकी आँखें पूरी लाल हो चुकी थीं।


और फिर…


वो बोलने लगी।


धीरे-धीरे।


टूटती हुई आवाज़ में।


“घर में रोज़ लड़ाई होती है…”


“पापा रोज़ शराब पीते हैं…”


“माँ को मारते हैं…”


“कल मुझे भी धक्का दिया…”


“सब कहते हैं लड़की बोझ होती है…”


“कभी-कभी लगता है… मैं पैदा ही क्यों हुई…”


हर शब्द के साथ उसका दर्द बाहर आता जा रहा था।


संयम चुपचाप सुनता रहा।


बीच में उसने एक बार भी नहीं टोका।


कशिश शायद पहली बार किसी के सामने अपना दिल खोल रही थी।


“मैं थक गई हूँ…”


उसकी आवाज़ भर्रा गई।


“मैं बहुत कोशिश करती हूँ सब ठीक रखने की… लेकिन मुझसे नहीं होता…”


उसकी साँसें तेज़ होने लगीं।


आँसू लगातार गिर रहे थे।


“घर जाने का मन नहीं करता…”


ये कहते ही वो नीचे बैठ गई और अपना चेहरा छुपाकर रोने लगी।


संयम वहीं खड़ा रहा।


उसके पास बहुत सारे शब्द थे…


लेकिन उस समय उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे।


कुछ दर्द ऐसे होते हैं…


जहाँ सलाह नहीं, सिर्फ साथ चाहिए होता है।


कुछ देर बाद वह धीरे से उसके पास बैठ गया।


उसने बस इतना कहा—


“अब से… तुम अकेली नहीं हो।”


कशिश ने धीरे-धीरे चेहरा उठाया।


उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं।


वो लगातार संयम को देखे जा रही थी।


शायद वो समझने की कोशिश कर रही थी कि—


क्या सच में कोई बिना मतलब इतना अच्छा हो सकता है?


संयम ने अपनी जेब से वही छोटा रुमाल निकाला…  

जिससे वो अक्सर अपना चेहरा साफ करता था।


उसने वो रुमाल कशिश की तरफ बढ़ाया।


“रो लो… अच्छा लगेगा।”


बस…


ये सुनते ही कशिश फिर रो पड़ी।


लेकिन इस बार उसके आँसू पहले जैसे नहीं थे।


पहले वो दर्द में रोती थी…


आज वो इसलिए रो रही थी क्योंकि पहली बार उसे लगा था—


कि शायद इस दुनिया में उसका भी कोई अपना है।

अध्याय 4  

“कभी-कभी इंसान प्यार इसलिए नहीं करता क्योंकि उसे सामने वाला खूबसूरत लगता है…  

बल्कि इसलिए क्योंकि उसके साथ रहकर जिंदगी थोड़ी आसान लगने लगती है।”  


अब कशिश बदलने लगी थी।


उसके चेहरे पर धीरे-धीरे मुस्कान लौट रही थी।


वो अब पहले जैसी डरी हुई लड़की नहीं लगती थी।


और इसकी वजह सिर्फ एक थी—


संयम।


अब दोनों अक्सर साथ रहने लगे थे।


कक्षा में…  

स्कूल के रास्ते में…  

छुट्टी के बाद…


हर जगह।


संयम को कशिश की छोटी-छोटी बातें तक याद रहने लगी थीं।


उसे कौन सी मिठाई पसंद है…  

कौन सा रंग अच्छा लगता है…  

किस बात से वो डर जाती है…


सब।


और कशिश…


वो धीरे-धीरे अपना पूरा दिल उसके पास छोड़ती जा रही थी।


एक दिन स्कूल में मेले की घोषणा हुई।


पूरा मैदान रंग-बिरंगी दुकानों से सज गया था।  

चारों तरफ रोशनी थी।  

बच्चों की आवाज़ें…  

हँसी…  

गाने…


कशिश शायद पहली बार किसी मेले में आई थी जहाँ उसके ऊपर घर की जिम्मेदारियों का बोझ नहीं था।


वो हर चीज़ को बच्चों की तरह देख रही थी।


“इतने सारे झूले…”


उसकी आँखों में चमक थी।


संयम उसे देख रहा था।


उसे कशिश की मुस्कान दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ लगती थी।


“चलो बैठते हैं।”


“मुझे डर लगता है।”


“मैं साथ हूँ।”


बस यही तीन शब्द कशिश को हर बार हिम्मत दे देते थे।


दोनों झूले पर बैठ गए।


जैसे ही झूला ऊपर गया, कशिश डरकर संयम का हाथ पकड़ बैठी।


और फिर तुरंत हाथ छोड़ दिया।


“माफ करना…”


संयम हल्का सा मुस्कुराया।


“इतना भी बुरा नहीं लगा।”


कशिश शर्मा गई।


उस दिन दोनों ने साथ गोलगप्पे खाए…  

एक ही कुल्हड़ से चाय पी…  

और घंटों मेले में घूमते रहे।


रात होने लगी थी।


मेले की रोशनियाँ अब और सुंदर लग रही थीं।


कशिश धीरे-धीरे चलते हुए बोली—


“काश… जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहती।”


संयम ने उसकी तरफ देखा।


“रहेगी।”


“तुम्हें इतना भरोसा कैसे होता है?”


“क्योंकि मैं हूँ ना।”


ये शब्द सुनकर कशिश चुप हो गई।


अब उसे सच में लगने लगा था कि शायद भगवान ने उसकी जिंदगी में किसी को भेजा है…  

जो उसके सारे दुख कम कर देगा।


दिन बीतते गए।


अब दोनों स्कूल के बाद कभी नदी किनारे बैठते…  

कभी पुराने मंदिर की सीढ़ियों पर घंटों बातें करते…


कशिश अपने सारे सपने उसे बताती।


“मैं एक दिन अपनी माँ को बहुत खुश रखूँगी…”


“उन्हें बड़ा घर दूँगी…”


“जहाँ कोई चिल्लाए नहीं…”


संयम बस उसे सुनता रहता।


उसकी आँखों में हमेशा वही अपनापन रहता था।


लेकिन…


हर कहानी हमेशा खूबसूरत नहीं रहती।


उस रात भी कशिश देर तक घर नहीं पहुँची थी।


क्योंकि वो संयम के साथ नदी किनारे बैठी बातें कर रही थी।


उसे नहीं पता था…


कि उसकी जिंदगी कुछ ही घंटों में पूरी तरह बदलने वाली है।


जब वो अपनी गली में पहुँची…


तो वहाँ भीड़ लगी हुई थी।


उसका दिल अचानक घबराने लगा।


घर के बाहर पुलिस की गाड़ी खड़ी थी।


एक तरफ एम्बुलेंस थी।


लोग धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे थे।


“बहुत बुरा हुआ…”


“रोज़ की लड़ाई थी…”


“आज जान चली गई…”


कशिश के कान सुन्न पड़ने लगे।


वो भीड़ को धक्का देते हुए अंदर भागी।


और फिर…


उसकी दुनिया वहीं रुक गई।


ज़मीन पर उसकी माँ सफेद कपड़े में ढकी हुई थी।


पास में खून के हल्के निशान थे।


उसके पिता को पुलिस पकड़कर बाहर ले जा रही थी।


वो अभी भी नशे में चीख रहे थे।


“गलती से हुआ…”


लेकिन अब कुछ बचा नहीं था।


कशिश वहीं बैठ गई।


उसकी आँखें खुली हुई थीं…  

लेकिन आँसू नहीं निकल रहे थे।


जैसे दर्द इतना बड़ा हो चुका था कि शरीर भी समझ नहीं पा रहा था कैसे प्रतिक्रिया दे।


कुछ देर बाद किसी औरत ने धीरे से कहा—


“अब अंतिम विदाई की तैयारी करो…”


कशिश ने माँ के चेहरे को आखिरी बार देखा।


और पहली बार जोर से रो पड़ी।


उस रात श्मशान में बहुत कम लोग थे।


हवा में जलती लकड़ियों की गंध फैली हुई थी।


कशिश काँपते हुए खड़ी थी।


लेकिन तभी एक बुजुर्ग आदमी बोला—


“लड़कियाँ चिता को अग्नि नहीं देतीं।”


ये सुनते ही कशिश की आँखें फिर भर आईं।


उसका कोई भाई बड़ा नहीं था।  

कोई रिश्तेदार आगे नहीं आया।


तभी…


संयम आगे बढ़ा।


उसने बिना कुछ कहे कशिश की तरफ देखा।


उस नजर में सवाल नहीं था…


सिर्फ साथ था।


कशिश धीरे-धीरे उसके पास आई।


और सबके सामने उसका हाथ पकड़ लिया।


उस पल…


उसने पूरी दुनिया छोड़कर सिर्फ संयम को चुना।


क्योंकि उस रात…


जब उसका अपना घर टूट गया था…


तब सिर्फ वही लड़का उसके साथ खड़ा था।

अध्याय 5  

“दो टूटे हुए लोग अक्सर एक-दूसरे को सबसे जल्दी समझ लेते हैं।”  


माँ के जाने के बाद कशिश की जिंदगी बिल्कुल खाली हो गई थी।


घर अब घर नहीं लगता था।


दीवारें वही थीं…  

कमरा वही था…  

लेकिन अब वहाँ माँ की आवाज़ नहीं थी।


ना सुबह जगाने वाली पुकार।  

ना थाली में रखी सूखी रोटियाँ।  

ना वो थका हुआ चेहरा…  

जो हर दर्द के बाद भी मुस्कुराने की कोशिश करता था।


अब घर में सिर्फ सन्नाटा था।


और उस सन्नाटे से कशिश को डर लगने लगा था।


उसके पिता जेल जा चुके थे।


मोहल्ले वाले अब उसे अजीब नजरों से देखते थे।


कुछ लोग सहानुभूति दिखाते…  

तो कुछ कानों में फुसफुसाते—


“बेचारी…”


“माँ चली गई… बाप जेल में…”


“अब इसका क्या होगा…”


कशिश ये सब सुनती…  

लेकिन जवाब नहीं देती।


अब उसमें लड़ने की ताकत नहीं बची थी।


इन सब दिनों में अगर कोई उसके साथ हर पल खड़ा था…  

तो वो सिर्फ संयम था।


वो रोज़ उसके लिए खाना लाता।  

उसका ध्यान रखता।  

स्कूल की किताबें समझाता।


और सबसे बड़ी बात—


वो उसे अकेला महसूस नहीं होने देता था।


एक शाम कशिश अचानक बोली—


“मैं तुम्हारा घर देखना चाहती हूँ।”


संयम कुछ पल चुप रहा।


उसके चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई।


लेकिन फिर उसने धीरे से सिर हिला दिया।


दोनों गाँव के आखिरी छोर की तरफ चलने लगे।


रास्ता धीरे-धीरे सुनसान होने लगा।


कच्ची सड़क…  

सूखे पेड़…  

और दूर खेतों के बीच बना एक पुराना घर।


घर काफी बड़ा था…  

लेकिन अजीब तरह से वीरान।


जैसे वहाँ सालों से खुशियाँ नहीं आई हों।


कशिश धीरे-धीरे अंदर गई।


घर में बहुत कम सामान था।


एक पुरानी मेज…  

कुछ किताबें…  

दीवार पर टंगी धूल भरी तस्वीरें…


और कमरे के कोने में बैठे एक बूढ़े आदमी।


उनकी लंबी सफेद दाढ़ी थी।  

आँखें गहरी और शांत।


संयम धीरे से बोला—


“ये मेरे दादा हैं।”


दादा ने कशिश की तरफ देखा और हल्की मुस्कान दी।


“तो यही है वो लड़की…”


संयम थोड़ा असहज हो गया।


कशिश पहली बार संयम को शर्माते हुए देख रही थी।


कुछ देर बाद दादा बाहर चले गए।


अब घर में सिर्फ कशिश और संयम थे।


कशिश धीरे-धीरे दीवार पर लगी एक तस्वीर के पास गई।


तस्वीर में एक आदमी और एक औरत थे।


दोनों मुस्कुरा रहे थे।


“ये तुम्हारे माता-पिता हैं?”


संयम की आँखें अचानक बदल गईं।


उसने धीरे से “हाँ” कहा।


“कहाँ हैं वो?”


कुछ पल खामोशी रही।


फिर संयम खिड़की की तरफ देखने लगा।


“अब नहीं हैं।”


कशिश चुप हो गई।


उसने धीरे से पूछा—


“क्या हुआ था?”


संयम ने गहरी साँस ली।


“जब मैं बहुत छोटा था… तब दोनों ने कुएँ में कूदकर जान दे दी थी।”


कशिश सन्न रह गई।


“क्यों…?”


संयम हल्का सा हँसा…


लेकिन वो हँसी दर्द से भरी थी।


“आज तक किसी को सही वजह नहीं पता।”


“गाँव वाले कहते हैं किसी ने जादू-टोना किया था…”


“कुछ कहते हैं घर पर बुरा साया था…”


“और कुछ लोग कहते हैं… वो दोनों जिंदगी से हार गए थे।”


कमरे में अचानक अजीब सी खामोशी फैल गई।


बाहर हवा तेज़ चलने लगी थी।


पुरानी खिड़कियाँ धीरे-धीरे आवाज़ कर रही थीं।


कशिश ने पहली बार महसूस किया—


संयम जितना बाहर से मजबूत दिखता है…  

अंदर से उतना ही टूटा हुआ है।


वो हमेशा दूसरों का दर्द समझ लेता था…


क्योंकि उसने खुद बहुत दर्द देखा था।


“तुम डरते नहीं यहाँ अकेले?”


कशिश ने धीमी आवाज़ में पूछा।


संयम कुछ पल उसे देखता रहा।


फिर धीरे से बोला—


“पहले डर लगता था…”


“लेकिन अब आदत हो गई है।”


उसकी आँखों में उस वक्त ऐसा अकेलापन था…  

जो शायद शब्दों में बताया नहीं जा सकता।


कशिश धीरे-धीरे उसके पास आई।


और पहली बार…


उसने खुद आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।


“अब तुम्हें अकेले रहने की आदत छोड़नी पड़ेगी।”


संयम उसे देखता रह गया।


उस पल दोनों कुछ नहीं बोले…


लेकिन शायद पहली बार दोनों को एहसास हुआ—


कि वो सिर्फ एक-दूसरे को पसंद नहीं करते…


बल्कि एक-दूसरे का सहारा बन चुके हैं।


अध्याय 6 

“हर कहानी में धोखा लालच की वजह से नहीं होता…  

कभी-कभी डर भी इंसान से सब कुछ छीन लेता है।”  


समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।


अब कशिश और संयम लगभग हर दिन साथ रहते थे।


गाँव में भी लोगों ने दोनों के बारे में बातें करना शुरू कर दिया था।


कुछ लोग कहते—


“दोनों एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं सकते।”


तो कुछ ताने मारते—


“देखना… ये रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चलेगा।”


लेकिन इन सब बातों से दूर…  

दोनों अपनी छोटी सी दुनिया में खुश थे।


अब कशिश पहले जैसी डरी हुई लड़की नहीं रही थी।


वो हँसने लगी थी।  

खुलकर बातें करने लगी थी।


और शायद…


पहली बार जिंदगी को जीने की कोशिश कर रही थी।


एक शाम दोनों नदी किनारे बैठे थे।


सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।


हवा शांत थी।


संयम घास पर लेटा आसमान को देख रहा था।


“एक दिन हम यहाँ से बहुत दूर चले जाएँगे।”


उसने मुस्कुराकर कहा।


कशिश चुप रही।


“जहाँ कोई हमें ताने ना दे…”


“जहाँ तुम्हें कभी रोना ना पड़े…”


“जहाँ हम नई जिंदगी शुरू करें…”


संयम सपने देख रहा था।


लेकिन कशिश की आँखों में उस दिन अजीब बेचैनी थी।


जैसे उसके अंदर कुछ चल रहा हो।


कुछ ऐसा…  

जो वो किसी को बता नहीं पा रही थी।


उस रात कशिश बहुत देर तक सो नहीं पाई।


मोहल्ले की औरतों की बातें उसके कानों में गूंज रही थीं—


“जिस घर में मौतें होती हैं… वहाँ कुछ अशुभ होता है…”


“पहले उसके माँ-बाप मरे…”


“अब वो लड़की भी उसके साथ घूमती रहती है…”


“कहीं वही साया उसके पीछे ना पड़ जाए…”


कशिश पहले इन बातों पर ध्यान नहीं देती थी।


लेकिन अब…


माँ की मौत…  

संयम का वीरान घर…  

उसके माता-पिता की रहस्यमयी मौत…


ये सब धीरे-धीरे उसके दिमाग में डर बनकर बैठने लगा था।


उसे लगने लगा—


शायद सच में संयम की जिंदगी में कुछ अशुभ है।


और जो भी उसके करीब आता है…


वो खत्म हो जाता है।


अगले दिन संयम हमेशा की तरह उसके लिए खाना लेकर आया।


दोनों स्कूल के पीछे पुराने मैदान में बैठे थे।


संयम लगातार बातें कर रहा था…


लेकिन आज कशिश बहुत शांत थी।


उसके हाथ हल्के काँप रहे थे।


उसने धीरे से पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ाई।


“पानी पी लो…”


संयम मुस्कुराया।


“इतना ध्यान रखोगी मेरा तो मैं बिगड़ जाऊँगा।”


कशिश बस उसे देखती रही।


उसकी आँखें धीरे-धीरे भरने लगीं।


संयम ने बोतल से पानी पिया।


कुछ पल सब सामान्य रहा।


फिर अचानक…


संयम जोर से खाँसने लगा।


उसकी साँसें अटकने लगीं।


कशिश घबरा गई।


“संयम…?”


अगले ही पल उसके मुँह से खून निकलने लगा।


ज़मीन पर लाल छींटे फैल गए।


संयम दर्द से तड़पने लगा।


उसकी आँखें डर से फैल चुकी थीं।


“क… कशिश…”


वो मुश्किल से उसका नाम बोल पाया।


कशिश पीछे हट गई।


उसके हाथ काँप रहे थे।


चेहरे पर आँसू बहने लगे।


संयम जमीन पर गिर चुका था।


उसकी साँसें धीरे-धीरे टूट रही थीं।


वो लगातार कशिश को देख रहा था…


जैसे आखिरी पल तक समझने की कोशिश कर रहा हो—


आखिर ऐसा क्यों हुआ।


कुछ ही मिनटों बाद…


सब खत्म हो गया।


चारों तरफ सिर्फ खामोशी बची थी।


हवा धीरे-धीरे चल रही थी।


और कशिश वहीं बैठी रो रही थी।


लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।


क्योंकि…


कशिश ने संयम को मार दिया था।

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