भैरवपुर का श्राप
अध्याय 1
बरसात का मौसम खत्म होने को था। पहाड़ियों से घिरा छोटा-सा गाँव “भैरवपुर” दिन में जितना शांत दिखाई देता था, रात होते ही उतना ही रहस्यमयी बन जाता था। गाँव के चारों ओर फैले पुराने पीपल और बरगद के पेड़ रात की हवा में ऐसे हिलते थे, जैसे किसी अनजान भाषा में बातें कर रहे हों।
भैरवपुर का मुखिया था — समर्थ।
सिर्फ़ 27 साल की उम्र में उसने पूरे गाँव की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी थी। उसकी तेज़ सोच, समझदारी और न्यायप्रिय स्वभाव के कारण गाँव का हर इंसान उसका सम्मान करता था। कोई खेत का झगड़ा हो, किसी गरीब के घर राशन पहुँचाना हो या रात में बीमार को शहर तक ले जाना — समर्थ हर जगह सबसे आगे रहता था।
लोग कहते थे,
“अगर समर्थ है… तो गाँव सुरक्षित है।”
लेकिन शायद इस बार मामला कुछ ऐसा था… जो इंसानों से जुड़ा हुआ नहीं था।
उस रात भी गाँव में सब कुछ सामान्य था। दूर मंदिर की घंटियों की आवाज़ आ रही थी और लोग अपने घरों में सो चुके थे। तभी अचानक गाँव के किनारे रहने वाली बूढ़ी औरत “जमुना काकी” चीखते हुए घर से बाहर भागी।
“वो फिर आ गया…!!
मैंने उसे फिर देखा…!!”
पूरा गाँव घबरा गया।
कुछ ही देर में समर्थ अपने हाथ में लालटेन लेकर वहाँ पहुँचा। उसकी आँखें हमेशा की तरह शांत थीं, लेकिन चेहरे पर हल्की चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
“क्या हुआ काकी?” समर्थ ने धीरे से पूछा।
जमुना काकी काँप रही थी।
उसकी आँखें डरी हुई थीं।
“वो… वो खिड़की के बाहर खड़ा था… पूरा काला… उसकी आँखें जल रही थीं… और वो मुझे घूर रहा था…”
भीड़ में खड़े लोग आपस में फुसफुसाने लगे।
“फिर वही साया…”
“तीन महीने बाद दोबारा…”
“कहीं पुरानी हवेली का श्राप तो वापस नहीं आ गया…”
समर्थ ने सबको शांत कराया।
वो ऐसी बातों पर जल्दी विश्वास नहीं करता था।
“कोई इंसान होगा। डर की वजह से तुम्हें भ्रम हुआ है।”
लेकिन तभी…
घर के पीछे से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज़ आई।
घ्र्ररररर…
पूरा माहौल अचानक शांत हो गया।
समर्थ तुरंत लालटेन लेकर पीछे की ओर बढ़ा। उसके पीछे गाँव के कुछ लोग भी डरते-डरते चले।
पीछे सिर्फ़ अंधेरा था।
बहुत गहरा अंधेरा।
अचानक समर्थ की नजर जमीन पर पड़ी।
कीचड़ में किसी के पैरों के निशान बने हुए थे…
लेकिन वो इंसानों जैसे नहीं थे।
उनमें सिर्फ़ तीन उंगलियाँ थीं।
भीड़ में खड़े एक आदमी की आवाज़ काँप गई —
“ये… ये इंसान के निशान नहीं हैं…”
समर्थ कुछ सेकंड तक उन निशानों को देखता रहा। उसके अंदर पहली बार हल्का डर पैदा हुआ।
लेकिन उसने अपने चेहरे पर डर नहीं आने दिया।
“कल सुबह मैं खुद जंगल की तरफ जाऊँगा। पता लगाऊँगा ये सब क्या है।”
उस रात समर्थ अपने घर लौटा, लेकिन उसे नींद नहीं आई।
बार-बार उसके दिमाग में वही तीन उंगलियों वाले निशान घूम रहे थे।
आधी रात के करीब अचानक उसकी खिड़की अपने आप खुल गई।
ठंडी हवा पूरे कमरे में फैल गई।
समर्थ तुरंत उठ बैठा।
और तभी…
उसे महसूस हुआ…
उसके कमरे के बाहर कोई खड़ा है।
धीरे-धीरे…
कदमों की आवाज़ आने लगी।
ठक…
ठक…
ठक…
समर्थ ने साहस जुटाकर दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ़ अंधेरा।
लेकिन जमीन पर एक चीज़ पड़ी थी।
एक पुरानी टूटी हुई गुड़िया…
जिसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।
और उसके नीचे मिट्टी से लिखा था —
“तहकीकात मत करो… वरना अगला नंबर तुम्हारा होगा…”
समर्थ कुछ पल तक बिल्कुल शांत खड़ा रहा।
पहली बार…
उसे एहसास हुआ…
भैरवपुर में कुछ बहुत गलत शुरू हो चुका था।
अध्याय 2
सुबह होते ही पूरे भैरवपुर में पिछली रात की घटना फैल चुकी थी। हर घर के बाहर बस एक ही चर्चा थी — आखिर वो काला साया कौन था?
कुछ लोग इसे पुरानी हवेली का श्राप बता रहे थे।
कुछ का कहना था कि जंगल में कोई दुष्ट आत्मा जाग चुकी है।
लेकिन समर्थ अब डरने वालों में से नहीं था।
उसके कमरे में रखी वो टूटी हुई गुड़िया और मिट्टी से लिखा संदेश बार-बार उसके दिमाग में घूम रहा था। कोई उसे डराना चाहता था… या शायद सच में कोई ऐसी ताकत थी जिसे इंसान समझ नहीं सकता था।
सुबह-सुबह समर्थ अपने सबसे भरोसेमंद दोस्त “वीर” के साथ जंगल की ओर निकल पड़ा।
वीर गाँव का बहादुर शिकारी था। उसने कई बार जंगल में जंगली जानवरों का सामना किया था, लेकिन आज उसके चेहरे पर भी हल्का डर साफ दिखाई दे रहा था।
“समर्थ… मुझे ये सब ठीक नहीं लग रहा,” वीर ने धीरे से कहा।
“डरने से सच नहीं बदलेगा,” समर्थ ने जवाब दिया।
“जो भी है… आज पता चल जाएगा।”
दोनों धीरे-धीरे जंगल के अंदर बढ़ने लगे।
जंगल सामान्य से ज्यादा शांत था।
ना पक्षियों की आवाज़…
ना हवा की सरसराहट…
बस पेड़ों के बीच अजीब-सी खामोशी फैली हुई थी।
समर्थ ने देखा कि कई पेड़ों पर अजीब निशान बने हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने तेज़ नाखूनों से लकड़ी को चीर दिया हो।
वीर अचानक रुक गया।
“ये देख…”
जमीन पर फिर वही तीन उंगलियों वाले निशान बने हुए थे।
लेकिन इस बार उनके साथ कुछ और भी था।
खून के सूखे हुए धब्बे।
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
समर्थ ने लालटेन नीचे की और ध्यान से देखा।
निशान सीधे जंगल के उस हिस्से की ओर जा रहे थे… जहाँ सालों पुरानी “काली हवेली” थी।
भैरवपुर की सबसे डरावनी जगह।
कहते थे कि कई साल पहले वहाँ एक जमींदार अपने पूरे परिवार के साथ रहता था। एक रात अचानक हवेली में आग लग गई… और पूरा परिवार ज़िंदा जल गया।
उसके बाद से वहाँ अजीब घटनाएँ होने लगीं।
जो भी रात में उस हवेली के पास गया…
वो कभी वापस नहीं लौटा।
समर्थ ऐसी कहानियों पर विश्वास नहीं करता था।
लेकिन आज उसके दिल की धड़कनें पहले से तेज़ थीं।
दोनों धीरे-धीरे हवेली तक पहुँचे।
हवेली अब खंडहर बन चुकी थी।
दीवारों पर काई जमी हुई थी।
खिड़कियाँ टूटी हुई थीं।
और अंदर से सड़न जैसी बदबू आ रही थी।
जैसे ही समर्थ अंदर जाने लगा…
अचानक हवेली के ऊपर बैठे कौवे जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
कांव…
कांव…
कांव…
वीर डरकर पीछे हट गया।
“समर्थ… हमें वापस चलना चाहिए।”
लेकिन समर्थ आगे बढ़ गया।
हवेली के अंदर घना अंधेरा था।
हर कदम पर लकड़ी की चरमराहट सुनाई दे रही थी।
अचानक…
ऊपर वाली मंज़िल से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आई।
दोनों रुक गए।
आवाज़ बहुत धीमी थी…
जैसे कोई दर्द में हो।
“क… कोई है ऊपर…” वीर फुसफुसाया।
समर्थ धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
हर कदम के साथ आवाज़ और साफ होती जा रही थी।
रोने की आवाज़…
फिर अचानक हँसी में बदल गई।
एक बहुत डरावनी हँसी।
वीर का गला सूखने लगा।
तभी ऊपर वाले कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
चिर्ररर…
कमरे के अंदर पूरा अंधेरा था।
लेकिन कमरे के बीचोंबीच…
एक छोटी लड़की खड़ी थी।
उसके लंबे बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे।
वो बिल्कुल हिल नहीं रही थी।
समर्थ ने साहस करके पूछा,
“तुम कौन हो?”
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर धीरे-धीरे लड़की ने अपना सिर उठाया।
उसकी आँखें पूरी काली थीं।
और होंठों पर अजीब मुस्कान थी।
वीर डरकर पीछे हट गया।
लेकिन इससे पहले कि वो कुछ समझ पाते…
लड़की अचानक गायब हो गई।
पूरा कमरा फिर से खाली हो चुका था।
और तभी…
समर्थ के पीछे किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा —
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”
समर्थ तुरंत पीछे मुड़ा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ़ दीवार पर खून से एक शब्द लिखा था —
“भागो…”
और उसी पल हवेली का दरवाज़ा जोर से बंद हो गया।
अध्याय 3
धड़ाम…!!
हवेली का मुख्य दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद हुआ कि पूरी इमारत काँप उठी। ऊपर की टूटी छत से धूल गिरने लगी। वीर का चेहरा डर से सफेद पड़ चुका था।
“समर्थ… ये जगह ठीक नहीं है… हमें निकलना होगा… अभी के अभी…!!”
लेकिन समर्थ की नजरें उस दीवार पर जमी थीं जहाँ खून से “भागो” लिखा था।
उसके अंदर डर जरूर था…
लेकिन उससे बड़ा था सच जानने का जुनून।
अचानक ऊपर कहीं से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज़ आने लगी।
घ्रररर…
घ्रररर…
ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी चीज़ लकड़ी के फर्श पर खींची जा रही हो।
वीर ने काँपती आवाज़ में कहा,
“वो… वो हमारे ऊपर है…”
समर्थ ने लालटेन उठाई और धीरे-धीरे आवाज़ की तरफ बढ़ने लगा।
हवेली का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह अंधेरे में डूबा हुआ था। दीवारों पर मकड़ियों के जाले लटक रहे थे। हवा में अजीब-सी बदबू थी… जैसे कई सालों से यहाँ मौत कैद हो।
दोनों एक लंबे गलियारे में पहुँचे।
गलियारे के आखिर में एक कमरा था…
जिसका दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
और अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी।
समर्थ कुछ पल रुका।
“इतने सालों से बंद हवेली में रोशनी कैसे हो सकती है…?”
वीर अब लगभग रोने की हालत में था।
“समर्थ… भगवान के लिए वापस चल…”
लेकिन समर्थ ने धीरे से दरवाज़ा खोला।
चिर्ररर…
दरवाज़ा खुलते ही दोनों की साँसें रुक गईं।
कमरे के अंदर दर्जनों मोमबत्तियाँ जल रही थीं।
दीवारों पर अजीब चिन्ह बने हुए थे।
फर्श पर राख फैली हुई थी।
और कमरे के बीचोंबीच…
एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।
उस कुर्सी पर कोई बैठा था।
एक बूढ़ा आदमी।
उसके लंबे सफेद बाल थे और शरीर बेहद कमजोर दिखाई दे रहा था। उसकी आँखें बंद थीं… जैसे वो कई सालों से वहीं बैठा हो।
वीर डरकर पीछे हट गया।
“ये… ये जिंदा है क्या…?”
समर्थ धीरे-धीरे उसके करीब गया।
तभी…
बूढ़े आदमी की आँखें अचानक खुल गईं।
उनकी आँखें पूरी सफेद थीं।
वीर चीख पड़ा।
लेकिन बूढ़ा आदमी शांत आवाज़ में बोला —
“आखिरकार… तुम आ ही गए…”
समर्थ कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
“तुम कौन हो?”
बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे मुस्कुराया।
“मैं वो हूँ… जिसने इस श्राप को शुरू होते देखा था…”
कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।
मोमबत्तियों की लौ हिलने लगी।
समर्थ ने पूछा,
“कौन-सा श्राप?”
बूढ़े आदमी की आवाज़ भारी हो गई।
“पच्चीस साल पहले…
इस गाँव ने एक बहुत बड़ा पाप किया था…”
अचानक कमरे की दीवारों पर अजीब परछाइयाँ बनने लगीं।
जैसे कोई कई लोग दीवारों पर रेंग रहे हों।
वीर अब काँप रहा था।
बूढ़ा आदमी बोलता गया —
“इस हवेली में रहने वाला जमींदार बहुत निर्दयी था। उसने गाँव के गरीब लोगों पर अत्याचार किए। एक रात गाँव वालों ने मिलकर उसके पूरे परिवार को हवेली में बंद कर आग लगा दी…”
समर्थ चौंक गया।
“लेकिन गाँव वालों ने तो कहा था कि वो हादसा था।”
बूढ़ा आदमी हँसा।
एक बहुत भयानक हँसी।
“झूठ… सब झूठ…!!
उस रात सिर्फ जमींदार का परिवार नहीं मरा था…”
कमरे की सभी मोमबत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
और उसी अंधेरे में…
किसी लड़की के रोने की आवाज़ गूँजने लगी।
समर्थ ने जल्दी से लालटेन जलाई।
लेकिन अब बूढ़ा आदमी अपनी कुर्सी पर नहीं था।
कुर्सी खाली थी।
वीर की साँसें तेज़ हो गईं।
“वो… वो कहाँ गया…?”
तभी कमरे के कोने से आवाज़ आई —
“उस रात…
एक छोटी बच्ची भी ज़िंदा जल गई थी…”
दोनों ने धीरे-धीरे उस कोने की ओर देखा।
वही लड़की खड़ी थी।
लंबे बाल…
काली आँखें…
और इस बार उसके चेहरे पर जलने के निशान थे।
उसकी त्वचा जगह-जगह से जली हुई दिखाई दे रही थी।
वो धीरे-धीरे समर्थ की तरफ बढ़ने लगी।
ठक…
ठक…
ठक…
हर कदम के साथ कमरे का तापमान और ठंडा होता जा रहा था।
समर्थ पहली बार पूरी तरह डर गया।
लेकिन तभी लड़की अचानक रुक गई।
उसने काँपती आवाज़ में कहा —
“मुझे इंसाफ चाहिए…”
और अगले ही पल…
पूरा कमरा जोर-जोर से हिलने लगा।
अध्याय 4
पूरा कमरा ऐसे काँप रहा था जैसे हवेली किसी भी पल टूटकर गिर जाएगी। दीवारों से मिट्टी झड़ने लगी। वीर डर के मारे जमीन पर बैठ गया।
“समर्थ… हमें यहाँ से निकलना होगा… ये इंसान नहीं है…!!”
लेकिन समर्थ की नजर उस लड़की पर टिकी हुई थी।
उसकी काली आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
डर नहीं…
गुस्सा नहीं…
बस गहरा दर्द।
“तुम्हारे साथ क्या हुआ था…?” समर्थ ने धीरे से पूछा।
लड़की कुछ पल तक चुप रही।
फिर अचानक पूरे कमरे में बच्चों के चीखने की आवाज़ें गूँजने लगीं।
“बचाओ…!!
दरवाज़ा खोलो…!!”
समर्थ ने अपने कान पकड़ लिए।
उसे ऐसा महसूस होने लगा जैसे वो उसी रात को अपनी आँखों से देख रहा हो।
हवेली में आग लगी हुई थी।
चारों तरफ धुआँ फैला था।
लोग बाहर खड़े थे…
लेकिन कोई अंदर फँसे लोगों को बचाने नहीं जा रहा था।
और तभी…
उसने उस छोटी लड़की को देखा।
वो दरवाज़े के पास खड़ी मदद माँग रही थी।
लेकिन बाहर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की।
अचानक दृश्य गायब हो गया।
समर्थ जोर-जोर से साँस लेने लगा।
उसे समझ आ चुका था…
ये आत्मा बदला नहीं चाहती थी।
वो इंसाफ चाहती थी।
तभी लड़की ने अपनी उंगली हवेली की दीवार की तरफ उठाई।
दीवार पर धीरे-धीरे खून से कुछ शब्द उभरने लगे —
“सच गाँव के मंदिर के नीचे छुपा है…”
इतना लिखते ही लड़की अचानक गायब हो गई।
कमरा शांत हो गया।
वीर ने तुरंत समर्थ का हाथ पकड़ा।
“बस बहुत हुआ… चल यहाँ से…!!”
दोनों तेजी से हवेली से बाहर भागे।
जैसे ही वो बाहर निकले…
हवेली की ऊपर वाली खिड़की में वही लड़की फिर दिखाई दी।
वो चुपचाप खड़ी उन्हें देख रही थी।
लेकिन इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था…
जैसे वो समर्थ से मदद की उम्मीद कर रही हो।
उस रात समर्थ बिल्कुल नहीं सो पाया।
बार-बार उसके दिमाग में वही शब्द घूम रहे थे —
“सच मंदिर के नीचे छुपा है…”
सुबह होते ही समर्थ सीधे गाँव के पुराने मंदिर पहुँचा।
वो मंदिर भैरवपुर का सबसे प्राचीन स्थान था। गाँव वाले मानते थे कि वहाँ भगवान भैरवनाथ की कृपा रहती है।
मंदिर के पुजारी “हरिदास बाबा” पिछले चालीस सालों से वहीं रह रहे थे।
समर्थ ने उनसे सीधा सवाल पूछा —
“बाबा… पच्चीस साल पहले हवेली में क्या हुआ था?”
ये सुनते ही बाबा का चेहरा उतर गया।
उनके हाथ काँपने लगे।
“त… तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो बेटा…?”
“क्योंकि गाँव में कुछ बहुत गलत हो रहा है।”
कुछ सेकंड तक बाबा चुप रहे।
फिर उन्होंने मंदिर का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।
“जो सच तुम खोज रहे हो…
वो इस गाँव को बर्बाद कर सकता है…”
समर्थ अब पूरी तरह गंभीर हो चुका था।
“मुझे सच जानना ही होगा।”
बाबा धीरे-धीरे मंदिर के पीछे बने पुराने कमरे में गए और एक जंग लगा लोहे का संदूक बाहर लाए।
उस संदूक पर राख जमी हुई थी।
बाबा ने काँपते हाथों से उसे खोला।
अंदर कुछ पुराने कागज़…
एक जली हुई तस्वीर…
और एक छोटी बच्ची की पायल रखी थी।
समर्थ ने तस्वीर उठाई।
तस्वीर में वही हवेली थी।
और उसके सामने खड़ी थी…
वही छोटी लड़की।
समर्थ की साँस रुक गई।
तस्वीर के पीछे एक नाम लिखा था —
“अनन्या”
और नीचे लिखा था —
“जिसे जिंदा जलाया गया…”
समर्थ ने हैरानी से बाबा की ओर देखा।
“गाँव वालों ने एक बच्ची को जिंदा जला दिया…?”
बाबा की आँखों में आँसू आ गए।
“उस रात गाँव वालों को लगा था कि जमींदार काला जादू करता है… गुस्से में सबने हवेली को आग लगा दी… लेकिन किसी को पता नहीं था कि उसकी छोटी बेटी अंदर रह गई थी…”
मंदिर के बाहर अचानक तेज हवा चलने लगी।
घंटी अपने आप बजने लगी।
टन्न्न…
टन्न्न…
टन्न्न…
और तभी…
मंदिर के फर्श के नीचे से किसी बच्ची की धीमी आवाज़ आई —
“मुझे अभी भी दर्द होता है…”
समर्थ और बाबा दोनों डरकर नीचे देखने लगे।
क्योंकि मंदिर का फर्श…
धीरे-धीरे अपने आप टूटने लगा था।
अध्याय 5
मंदिर का फर्श धीरे-धीरे टूट रहा था।
पत्थरों के बीच गहरी दरारें बनने लगीं और नीचे से बर्फ जैसी ठंडी हवा बाहर आने लगी। पूरा मंदिर काँप रहा था। दीवारों पर लगी भगवान भैरवनाथ की तस्वीरें हिलने लगीं।
हरिदास बाबा घबराकर पीछे हट गए।
“हे भगवान… इतने साल बाद वो जगह फिर खुल रही है…”
समर्थ ने तुरंत एक जलती मशाल उठाई और टूटे हुए हिस्से के पास पहुँचा।
नीचे अंधेरा था।
बहुत गहरा अंधेरा।
ऐसा लग रहा था जैसे जमीन के नीचे कोई पुराना तहखाना छुपा हो।
और उसी अंधेरे से फिर वही आवाज़ आई —
“मुझे बाहर निकालो…”
वीर, जो अभी-अभी मंदिर पहुँचा था, ये सब देखकर सन्न रह गया।
“समर्थ… नीचे मत जाना…
मुझे अच्छा नहीं लग रहा…”
लेकिन अब समर्थ पीछे हटने वाला नहीं था।
उसने रस्सी बाँधी और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।
जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, हवा और ठंडी होती जा रही थी।
दीवारों पर अजीब निशान बने हुए थे।
कुछ मंत्र जैसे…
कुछ चेतावनी जैसे।
नीचे पहुँचते ही समर्थ की मशाल काँपने लगी।
वो जगह किसी पुराने तहखाने जैसी थी।
चारों तरफ मिट्टी…
जाले…
और टूटी हुई लकड़ियाँ फैली थीं।
लेकिन तभी उसकी नजर सामने पड़ी एक चीज़ पर जाकर रुक गई।
दीवारों पर बच्चों के हाथों के निशान बने हुए थे।
छोटे-छोटे हाथ…
जैसे किसी ने बाहर निकलने की कोशिश की हो।
समर्थ के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
तभी अचानक पीछे से किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।
ही…
ही…
ही…
समर्थ तुरंत पलटा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ अंधेरा।
और फिर…
मशाल अपने आप बुझ गई।
पूरा तहखाना अंधेरे में डूब गया।
समर्थ की साँसें तेज हो गईं।
उसे महसूस हुआ…
कोई उसके बहुत करीब खड़ा है।
इतना करीब कि उसकी ठंडी साँसें समर्थ के चेहरे से टकरा रही थीं।
समर्थ ने काँपती आवाज़ में कहा —
“क… कौन है…?”
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर उसी अंधेरे में किसी बच्ची की धीमी आवाज़ गूँजी —
“क्या तुम सच में मेरी मदद करोगे…?”
समर्थ ने हिम्मत करके जवाब दिया —
“हाँ।”
अचानक तहखाने में नीली रोशनी फैलने लगी।
धीरे-धीरे वही लड़की सामने दिखाई देने लगी।
अनन्या।
लेकिन इस बार उसका चेहरा पहले जैसा डरावना नहीं था।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मैं बुरी नहीं हूँ…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
“मैं बस अकेली हूँ…”
समर्थ कुछ पल तक चुप रहा।
“तुम्हारे साथ उस रात क्या हुआ था?”
अनन्या ने काँपते हुए तहखाने के कोने की ओर इशारा किया।
वहाँ मिट्टी के नीचे कुछ दबा हुआ था।
समर्थ धीरे-धीरे वहाँ गया और हाथों से मिट्टी हटाने लगा।
कुछ ही देर में उसका हाथ किसी लकड़ी से टकराया।
वो एक पुराना छोटा संदूक था।
समर्थ ने उसे खोला।
अंदर कुछ पुराने खिलौने…
एक लाल कपड़ा…
और एक डायरी रखी थी।
डायरी पूरी तरह जली हुई थी, लेकिन कुछ पन्ने अब भी बचे थे।
समर्थ ने पहला पन्ना खोला।
उस पर लिखा था —
“अगर ये डायरी किसी को मिले…
तो समझ लेना कि असली राक्षस हवेली में नहीं…
गाँव में हैं…”
समर्थ की आँखें फैल गईं।
वो आगे पढ़ने लगा।
“पिताजी गलत थे…
लेकिन गाँव वालों ने मासूमों को भी नहीं छोड़ा…
उन्होंने मुझे कमरे में बंद कर दिया…
मैं बहुत चिल्लाई…
लेकिन किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला…”
डायरी पढ़ते-पढ़ते समर्थ के हाथ काँपने लगे।
तभी ऊपर मंदिर से लोगों की चीखें सुनाई दीं।
“बचाओ…!!
कोई बचाओ…!!”
समर्थ तुरंत ऊपर की तरफ भागा।
जैसे ही वो तहखाने से बाहर निकला…
उसकी आँखें फटी रह गईं।
पूरा मंदिर खून जैसे लाल धुएँ से भर चुका था।
गाँव वाले इधर-उधर भाग रहे थे।
और मंदिर के बीचोंबीच…
हरिदास बाबा हवा में लटके हुए थे।
उनकी आँखें डर से बाहर निकली हुई थीं।
और दीवार पर खून से लिखा था —
“झूठ बोलने वालों की सजा शुरू हो चुकी है…”
अचानक बाबा जोर से नीचे गिरे।
समर्थ भागकर उनके पास पहुँचा।
बाबा की साँसें टूट रही थीं।
उन्होंने मुश्किल से समर्थ का हाथ पकड़ा और काँपती आवाज़ में कहा —
“अ… असली सच…
मुखिया के पुराने घर में छुपा है…”
“कौन-सा सच…?” समर्थ चिल्लाया।
लेकिन बाबा कुछ बोल पाते…
उससे पहले उनकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
और उसी पल…
मंदिर की सारी घंटियाँ अपने आप एक साथ बजने लगीं।
अध्याय 6
हरिदास बाबा की मौत के बाद पूरे भैरवपुर में डर फैल चुका था। शाम होते ही लोग अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लेते। गलियाँ खाली रहने लगीं। बच्चों की हँसी गायब हो चुकी थी।
लेकिन समर्थ के दिमाग में सिर्फ़ एक बात घूम रही थी —
“असली सच… पुराने मुखिया के घर में छुपा है…”
पुराना मुखिया…
यानी समर्थ के दादा “रघुवीर सिंह”।
भैरवपुर के सबसे ताकतवर आदमी।
समर्थ बचपन से सुनता आया था कि उसके दादा बहुत न्यायप्रिय थे। गाँव वाले आज भी उनका नाम सम्मान से लेते थे।
लेकिन अब…
उसके मन में पहली बार शक पैदा हुआ।
रात गहराने लगी थी जब समर्थ अकेला पुराने हवेलीनुमा घर की तरफ बढ़ा। वो घर कई सालों से बंद पड़ा था। दीवारों पर धूल और काई जमी हुई थी।
जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला…
चिर्ररर…
अंदर से ठंडी हवा का झोंका बाहर आया।
घर पूरी तरह अंधेरे में डूबा था।
समर्थ धीरे-धीरे अंदर बढ़ने लगा।
हर कमरे में पुरानी तस्वीरें लगी थीं।
पुरानी कुर्सियाँ…
टूटे हुए बर्तन…
और दीवारों पर समय की धूल।
तभी उसकी नजर एक तस्वीर पर जाकर रुकी।
तस्वीर में उसके दादा कुछ गाँव वालों के साथ खड़े थे।
लेकिन पीछे धुंधली-सी एक छोटी लड़की भी दिखाई दे रही थी।
अनन्या।
समर्थ की धड़कनें तेज हो गईं।
“दादा का उससे क्या संबंध था…?”
तभी अचानक ऊपर वाली मंज़िल से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम…!!
समर्थ तुरंत लालटेन लेकर ऊपर भागा।
ऊपर एक लंबा गलियारा था…
और आखिर में एक कमरा।
उस कमरे पर भारी लोहे का ताला लगा हुआ था।
समर्थ ने ताले को देखा।
उस पर राख से एक निशान बना था —
तीन उंगलियों वाला वही निशान।
समर्थ ने जोर लगाकर ताला तोड़ा।
कमरा खुलते ही बदबू का तेज़ झोंका बाहर आया।
कमरे में हर जगह पुराने कागज़ बिखरे थे।
दीवारों पर अजीब मंत्र लिखे थे।
और बीच में एक लकड़ी की मेज़ रखी थी।
मेज़ पर एक पुरानी डायरी थी।
उस डायरी पर लिखा था —
“रघुवीर सिंह — निजी लेख”
समर्थ ने काँपते हाथों से डायरी खोली।
पहले कुछ पन्नों में गाँव के काम लिखे थे।
लेकिन फिर अचानक लिखावट बदल गई।
“आज गाँव वालों का गुस्सा नियंत्रण से बाहर था…
उन्होंने हवेली को आग लगाने का फैसला कर लिया…”
समर्थ तेजी से पढ़ने लगा।
“मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की…
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी…”
समर्थ की आँखें फैल गईं।
तो क्या उसके दादा निर्दोष थे…?
लेकिन अगले पन्ने ने उसकी साँस रोक दी।
“आग के बाद मुझे तहखाने में वो बच्ची मिली…
वो अभी ज़िंदा थी…”
समर्थ का दिल जोर से धड़कने लगा।
वो आगे पढ़ने लगा।
“अगर गाँव वालों को पता चलता…
तो वो उसे भी मार देते…
इसलिए मैंने उसे मंदिर के नीचे छुपा दिया…”
समर्थ सन्न रह गया।
“अनन्या… आग में नहीं मरी थी…?”
तभी अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम…!!
पूरा कमरा ठंडा हो गया।
और अंधेरे कोने से वही धीमी आवाज़ आई —
“उन्होंने मुझे बचाया नहीं था…”
समर्थ ने धीरे-धीरे पीछे देखा।
अनन्या वहाँ खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा डरावना था।
उसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।
“उन्होंने मुझे छुपा दिया…
अकेला छोड़ दिया…”
कमरे की दीवारों पर खून जैसे निशान उभरने लगे।
“मैं कई दिनों तक तहखाने में बंद रही…
मैं चीखती रही…
लेकिन कोई नहीं आया…”
समर्थ का शरीर सुन्न पड़ गया।
उसके दादा…
जिन्हें वो हमेशा महान समझता था…
उन्होंने एक बच्ची को बचाने के बजाय छुपा दिया था।
अनन्या की आवाज़ अचानक भारी हो गई —
“और अब…
हर उस इंसान को सच का सामना करना होगा…
जिसने उस रात चुप्पी चुनी थी…”
अचानक कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।
बाहर तेज़ तूफान शुरू हो चुका था।
और उसी बिजली की चमक में…
समर्थ को कुछ ऐसा दिखाई दिया…
जिससे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
दीवार पर टंगी एक और तस्वीर में…
उसके दादा के ठीक बगल में खड़ा इंसान…
हरिदास बाबा थे।
अध्याय 7
बिजली की तेज़ चमक कमरे में फैली और फिर सब कुछ दोबारा अंधेरे में डूब गया।
समर्थ की नजर उस तस्वीर पर जमी रह गई।
रघुवीर सिंह…
और उनके साथ हरिदास बाबा।
दोनों के चेहरे डरे हुए लग रहे थे।
जैसे वो किसी ऐसे राज़ को छुपा रहे हों…
जो कभी बाहर नहीं आना चाहिए था।
समर्थ ने कांपते हाथों से तस्वीर उतारी।
तस्वीर के पीछे कुछ लिखा हुआ था —
“उस रात जो हुआ…
वो भगवान भी माफ नहीं करेंगे…”
समर्थ की सांस भारी हो गई।
उसे अब समझ आने लगा था कि ये सब सिर्फ़ आत्माओं का खेल नहीं था।
इस गाँव ने सचमुच कोई बहुत बड़ा पाप किया था।
तभी अचानक कमरे में किसी के चलने की आवाज़ आई।
ठक…
ठक…
ठक…
समर्थ ने तुरंत पीछे देखा।
गलियारे के अंधेरे में कोई खड़ा था।
एक लंबा साया।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
समर्थ ने लालटेन ऊपर की।
लेकिन अगले ही पल वो साया गायब हो गया।
सिर्फ़ दीवार पर नाखूनों से लिखा एक शब्द बचा था —
“कुआँ…”
समर्थ कुछ पल तक सोचता रहा।
फिर अचानक उसे याद आया।
गाँव के बाहर एक पुराना सूखा कुआँ था…
जिसे कई साल पहले बंद कर दिया गया था।
गाँव वाले कहते थे कि वहाँ रात में रोने की आवाज़ें आती हैं।
समर्थ तुरंत वहाँ जाने के लिए निकला।
बाहर तूफान और तेज़ हो चुका था।
पेड़ों की शाखाएँ हवा में जोर-जोर से हिल रही थीं।
आसमान में बिजली चमक रही थी।
जब समर्थ पुराने कुएँ के पास पहुँचा…
तो वहाँ का माहौल बाकी गाँव से बिल्कुल अलग था।
चारों तरफ अजीब सन्नाटा फैला था।
यहाँ तक कि हवा भी नहीं चल रही थी।
कुएँ के आसपास की मिट्टी पर फिर वही तीन उंगलियों वाले निशान बने हुए थे।
समर्थ धीरे-धीरे कुएँ के पास गया।
अंदर सिर्फ़ गहरा अंधेरा था।
लेकिन तभी…
उसे नीचे से किसी आदमी की धीमी आवाज़ सुनाई दी —
“मुझे बाहर निकालो…”
समर्थ चौंक गया।
आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी।
उसने जल्दी से रस्सी नीचे डाली।
कुछ सेकंड बाद…
रस्सी अचानक भारी हो गई।
समर्थ पूरी ताकत से उसे ऊपर खींचने लगा।
धीरे-धीरे अंधेरे से एक बूढ़ा आदमी ऊपर आया।
उसकी हालत बेहद खराब थी।
लंबी दाढ़ी…
फटे कपड़े…
और आँखों में डर।
जैसे वो कई सालों से कैद हो।
समर्थ हैरान रह गया।
“तुम… कौन हो…?”
बूढ़ा आदमी काँपती आवाज़ में बोला —
“मैं… माधव हूँ…”
समर्थ की आँखें फैल गईं।
माधव…
ये वही नाम था…
जो हवेली के पुराने नौकर का था।
लेकिन गाँव वालों के अनुसार…
माधव तो पच्चीस साल पहले मर चुका था।
“तुम जिंदा कैसे हो…?” समर्थ ने पूछा।
माधव रोने लगा।
“उन्होंने मुझे मरने के लिए यहाँ फेंक दिया था…”
“किसने…?”
माधव की आँखों में डर उतर आया।
उसने काँपते हुए कहा —
“गाँव वालों ने…
और तुम्हारे दादा ने…”
समर्थ का दिल जोर से धड़कने लगा।
“क्यों…?”
माधव ने भारी सांस ली।
“क्योंकि मैंने सच देख लिया था…”
अचानक आसमान में बिजली चमकी।
और उसी रोशनी में समर्थ ने देखा…
माधव के पैरों के पास मिट्टी में कुछ पड़ा था।
एक पुराना ताबीज।
समर्थ ने जैसे ही उसे उठाया…
उसके दिमाग में अचानक अजीब दृश्य घूमने लगे।
आग…
चीखें…
भागते लोग…
और एक आदमी…
जो हवेली में आग लगा रहा था।
वो आदमी कोई और नहीं…
बल्कि हरिदास बाबा थे।
समर्थ का सिर दर्द से फटने लगा।
ताबीज उसके हाथ से गिर गया।
माधव रोते हुए बोला —
“गाँव वालों को भड़काने वाला वही था…
उसे लगता था जमींदार काला जादू करता है…”
“लेकिन जब उसे पता चला कि एक बच्ची जिंदा बच गई है…
तो उसने उसे तहखाने में बंद रहने दिया…”
समर्थ स्तब्ध रह गया।
तो असली दोषी…
हरिदास बाबा थे।
लेकिन तभी…
माधव का चेहरा अचानक डर से भर गया।
वो कुएँ के पीछे देखने लगा।
“व… वो आ गई…”
समर्थ ने धीरे-धीरे पीछे देखा।
अंधेरे में अनन्या खड़ी थी।
लेकिन इस बार वो रो नहीं रही थी।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
और उसने पहली बार समर्थ से कहा —
“अब तुम्हें आखिरी सच जानना होगा…”
अध्याय 8
अनन्या की मुस्कान इस बार अलग थी।
डरावनी नहीं…
बल्कि ऐसी…
जैसे वो किसी बहुत बड़े राज़ के खुलने का इंतज़ार कर रही हो।
तेज़ हवा अचानक पूरी तरह रुक गई।
पूरा वातावरण एकदम शांत हो गया।
इतना शांत…
कि समर्थ को अपनी धड़कनें तक सुनाई देने लगीं।
माधव डर के मारे पीछे हटने लगा।
“न… नहीं…
उसे मत सुनना…
वो तुम्हें भी अपने साथ ले जाएगी…”
लेकिन अनन्या की नजरें सिर्फ़ समर्थ पर टिकी थीं।
उसने धीरे-धीरे अपना हाथ कुएँ के पीछे फैले जंगल की ओर उठाया।
“सच…
वहाँ दफन है…”
इतना कहकर वो धीरे-धीरे धुएँ की तरह हवा में गायब हो गई।
समर्थ कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा।
उसके मन में अब सवाल ही सवाल थे।
अगर हरिदास बाबा असली दोषी थे…
तो फिर अनन्या की आत्मा अब तक शांत क्यों नहीं हुई?
और सबसे बड़ा सवाल…
वो तीन उंगलियों वाले निशान किसके थे?
क्योंकि वो इंसान के नहीं हो सकते थे।
माधव अचानक काँपती आवाज़ में बोला —
“तुम अभी भी सब नहीं जानते…”
समर्थ ने उसकी तरफ देखा।
माधव की आँखें डर से फैली हुई थीं।
“उस रात हवेली में सिर्फ आग नहीं लगी थी…
कुछ और भी जाग गया था…”
समर्थ के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“क्या मतलब…?”
माधव कुछ बोल पाता…
उससे पहले जंगल के अंदर से किसी जानवर जैसी भयानक आवाज़ गूँजी।
घ्राआआर्ऱ…!!
पेड़ों पर बैठे सारे कौवे एक साथ उड़ गए।
माधव चीख पड़ा।
“वो आ गया…!!
भागो…!!”
अचानक जंगल के अंधेरे में दो लाल चमकती आँखें दिखाई दीं।
बहुत बड़ी…
और बिल्कुल स्थिर।
समर्थ का गला सूख गया।
वो आँखें इंसान की नहीं थीं।
धीरे-धीरे अंधेरे से एक विशाल साया बाहर आने लगा।
उसका शरीर झुका हुआ था।
हाथ असामान्य रूप से लंबे थे।
और पैरों में सिर्फ़ तीन उंगलियाँ थीं।
समर्थ का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“ये… क्या है…?”
माधव काँपते हुए बोला —
“हवेली की आग में सिर्फ लोग नहीं मरे थे…
उस रात काले अनुष्ठान भी हुए थे…”
साया अब धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था।
उसकी साँसें जानवर जैसी भारी थीं।
घ्रररर…
समर्थ पहली बार पूरी तरह डर गया।
लेकिन तभी…
उसके हाथ में पकड़ा ताबीज चमकने लगा।
साये ने जैसे ही ताबीज देखा…
वो अचानक रुक गया।
उसकी लाल आँखों में गुस्सा भर गया।
और अगले ही पल…
वो अंधेरे में वापस गायब हो गया।
पूरा जंगल फिर शांत हो गया।
समर्थ ने हैरानी से ताबीज को देखा।
“ये क्या है…?”
माधव धीरे-धीरे जमीन पर बैठ गया।
“ये ताबीज उस आदमी का था…
जो हवेली में काला अनुष्ठान करता था…”
“जमींदार…?”
माधव ने सिर हिलाया।
“नहीं…”
समर्थ की साँस रुक गई।
माधव ने काँपते हुए कहा —
“तुम्हारे दादा…”
समर्थ कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांत खड़ा रह गया।
उसके कानों में जैसे आवाज़ें बंद हो गईं।
“न… नहीं…
ये झूठ है…”
माधव की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तुम्हारे दादा बाहर से अच्छे थे…
लेकिन रात में वो हवेली में जाते थे…
उन्हें शक्ति चाहिए थी…
और हरिदास बाबा उनकी मदद करते थे…”
समर्थ के हाथ काँपने लगे।
जिस इंसान को वो अपना आदर्श मानता था…
क्या वो सच में इतना खतरनाक था?
लेकिन तभी…
समर्थ को अचानक एक बात याद आई।
डायरी में लिखा था —
“मैंने उसे बचाने की कोशिश की…”
अगर उसके दादा बुरे थे…
तो उन्होंने अनन्या को बचाया क्यों?
कुछ तो ऐसा था…
जो अब तक छुपा हुआ था।
और शायद…
यही असली सच था।
तभी अचानक समर्थ को महसूस हुआ…
कोई उसके पीछे खड़ा है।
बहुत करीब।
उसकी गर्दन पर ठंडी साँसें पड़ने लगीं।
धीरे-धीरे उसने पीछे मुड़कर देखा…
और उसकी आँखें डर से फैल गईं।
क्योंकि इस बार वहाँ अनन्या नहीं थी।
बल्कि…
उसके अपने दादा खड़े थे।
जले हुए चेहरे के साथ।
और उन्होंने मुस्कुराकर कहा —
“सच जानना चाहते हो…?
तो आज रात हवेली वापस आना… अकेले…”
अध्याय 9 — “जली हुई परछाई”
समर्थ की सांसें रुक गईं।
उसके सामने खड़े इंसान का चेहरा आधा जला हुआ था।
आंखें गहरी काली…
और होंठों पर अजीब मुस्कान।
लेकिन वो चेहरा…
वो आवाज़…
उसके दादा रघुवीर सिंह की थी।
तेज़ हवा फिर चलने लगी।
पेड़ों की शाखाएँ जोर-जोर से हिलने लगीं।
माधव डर के मारे जमीन पर गिर पड़ा।
“मत जाओ…!!
अगर तुम आज रात हवेली गए…
तो वापस नहीं लौटोगे…”
लेकिन समर्थ की नजरें उस जली हुई परछाई पर टिकी थीं।
“आप… सच में मेरे दादा हैं…?”
परछाई धीरे-धीरे मुस्कुराई।
“कुछ सच…
मौत के बाद भी खत्म नहीं होते…”
इतना कहकर वो धुएँ की तरह हवा में गायब हो गई।
समर्थ कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा।
उसका मन अब पूरी तरह उलझ चुका था।
कौन सच बोल रहा था…?
अनन्या…?
माधव…?
या उसके दादा की आत्मा…?
लेकिन एक बात तय थी।
आज रात हवेली में कुछ ऐसा होने वाला था…
जो सब बदल देगा।
•••
रात होते-होते पूरा भैरवपुर अंधेरे में डूब गया।
आसमान में बादल छाए थे।
चाँद बार-बार बादलों के पीछे गायब हो रहा था।
समर्थ अकेला हवेली की तरफ बढ़ रहा था।
उसके हाथ में वही ताबीज था।
जैसे-जैसे वो हवेली के करीब पहुँच रहा था…
उसका दिल उतनी तेजी से धड़क रहा था।
आज हवेली पहले से अलग लग रही थी।
ऊपर टूटी खिड़कियों में हल्की लाल रोशनी जल रही थी।
जैसे अंदर कोई उसका इंतज़ार कर रहा हो।
समर्थ ने धीरे से दरवाज़ा खोला।
चिर्ररर…
अंदर कदम रखते ही उसे महसूस हुआ…
आज हवेली खाली नहीं थी।
ऊपर कहीं से फुसफुसाने की आवाज़ें आ रही थीं।
बहुत सारी आवाज़ें।
जैसे कई लोग एक साथ धीमे-धीमे कुछ बोल रहे हों।
समर्थ धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
हर कदम के साथ आवाज़ें और साफ होती जा रही थीं।
“सच…”
“खून…”
“धोखा…”
अचानक हवेली की सारी मोमबत्तियाँ अपने आप जल उठीं।
समर्थ रुक गया।
ऊपर वाले बड़े कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था।
और अंदर…
कई लोग खड़े थे।
गाँव वाले।
लेकिन उनके चेहरे अजीब थे।
सबकी आँखें बंद थीं।
जैसे वो किसी के वश में हों।
कमरे के बीचोंबीच एक बड़ा गोल निशान बना हुआ था।
उसके चारों तरफ राख फैली थी।
और उस निशान के बीच खड़ा था…
रघुवीर सिंह।
पूरा जला हुआ शरीर…
लेकिन चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।
समर्थ का गला सूख गया।
“ये… क्या हो रहा है…?”
रघुवीर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।
“जिस सच को तुम खोज रहे हो…
वो तुम्हारी सोच से कहीं ज्यादा डरावना है…”
अचानक कमरे की दीवारों पर आग की लपटें दिखाई देने लगीं।
और समर्थ के सामने पुराने दृश्य उभरने लगे।
पच्चीस साल पहले की वही रात…
गाँव वाले हवेली के बाहर खड़े थे।
हरिदास बाबा लोगों को भड़का रहे थे।
“ये हवेली अपवित्र है…!!
इसे खत्म करना होगा…!!”
भीड़ ने आग लगा दी।
लेकिन तभी…
हवेली के अंदर तहखाने में…
रघुवीर सिंह किसी अजीब अनुष्ठान में बैठे थे।
उनके सामने काले कपड़ों में एक आदमी खड़ा था।
और जमीन पर बनी थी…
तीन उंगलियों वाले निशान की आकृति।
समर्थ की आँखें फैल गईं।
“तो माधव सच बोल रहा था…”
लेकिन अगले ही पल दृश्य बदल गया।
रघुवीर अचानक चिल्लाने लगे —
“मैंने ये शक्ति गाँव को बचाने के लिए माँगी थी…!!
लेकिन वो चीज़ नियंत्रण से बाहर हो गई…”
अचानक अंधेरे से वही तीन उंगलियों वाला साया निकल आया।
उसकी लाल आँखें आग की तरह चमक रही थीं।
वो इंसान नहीं था।
कुछ और था।
उसने हवेली में मौजूद लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया।
चीखें…
आग…
खून…
हर तरफ अफरा-तफरी।
समर्थ का शरीर कांपने लगा।
तभी उसने देखा…
अनन्या तहखाने में बंद थी।
वो दरवाज़ा पीट रही थी।
और रघुवीर उसे बचाने भागे थे।
लेकिन तभी…
हरिदास बाबा ने बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया।
समर्थ की साँस रुक गई।
तो उसके दादा ने अनन्या को बचाने की कोशिश की थी…
लेकिन असली गुनहगार…
हरिदास बाबा थे।
अचानक सारे दृश्य गायब हो गए।
कमरा फिर अंधेरे में डूब गया।
रघुवीर की आत्मा धीरे-धीरे बोली —
“मैं पापी था…
लेकिन हत्यारा नहीं…”
“और वो चीज़…
आज भी जिंदा है…”
अचानक हवेली के नीचे से जोरदार धमाका हुआ।
धड़ाआआम…!!
पूरा फर्श हिलने लगा।
गाँव वालों की बंद आँखें अचानक खुल गईं।
और सबने एक साथ समर्थ की तरफ देखकर कहा —
“वो जाग चुका है…”
अध्याय 10
पूरा हवेली जोर-जोर से काँप रही थी।
नीचे तहखाने से किसी विशाल चीज़ के गरजने की आवाज़ आ रही थी।
घ्राआआर्ऱ…!!
दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं।
मोमबत्तियाँ अपने आप बुझने लगीं।
और हवा इतनी ठंडी हो चुकी थी कि लोगों की साँसें दिखाई देने लगीं।
समर्थ समझ चुका था…
वो तीन उंगलियों वाला साया कोई साधारण आत्मा नहीं था।
वो उस अधूरे काले अनुष्ठान की पैदा की हुई शापित शक्ति थी…
जिसे रघुवीर सिंह ने वर्षों पहले जगाया था।
लेकिन अब वो पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी।
गाँव वाले डर के मारे चीखने लगे।
“हमें बचाओ मुखिया जी…!!”
समर्थ ने पहली बार महसूस किया…
पूरा भैरवपुर उसकी तरफ उम्मीद से देख रहा था।
जैसे हमेशा देखता आया था।
तभी रघुवीर की आत्मा समर्थ के पास आई।
उनकी आँखों में पछतावा साफ था।
“इस श्राप को खत्म करने का सिर्फ एक तरीका है…”
समर्थ ने गंभीर आवाज़ में पूछा —
“क्या…?”
रघुवीर धीरे से बोले —
“जिस खून ने इसे जगाया…
उसी खून को इसकी आग में समाना होगा…”
समर्थ की साँस रुक गई।
क्योंकि वो समझ चुका था…
रघुवीर का खून…
यानी उसका अपना खून।
तभी हवेली का फर्श टूट गया।
नीचे अंधेरे से वही विशाल साया बाहर निकल आया।
उसका शरीर धुएँ जैसा काला था।
लाल आँखें जल रही थीं।
और उसके लंबे हाथ जमीन को चीर रहे थे।
गाँव वाले डरकर भागने लगे।
साया जोर से गरजा।
घ्राआआर्ऱ…!!
उसकी आवाज़ से पूरी हवेली हिल उठी।
अनन्या की आत्मा अचानक समर्थ के सामने प्रकट हुई।
इस बार उसका चेहरा शांत था।
“अगर इसे अभी नहीं रोका…
तो पूरा गाँव खत्म हो जाएगा…”
समर्थ की आँखों में आँसू उतर आए।
उसने पूरे गाँव की तरफ देखा।
ये वही लोग थे…
जिन्होंने उसे बचपन से प्यार दिया।
सम्मान दिया।
और वो उन्हें मरते हुए नहीं देख सकता था।
समर्थ धीरे-धीरे उस साये की तरफ बढ़ा।
वीर चीख पड़ा —
“नहीं समर्थ…!!
मत जाओ…!!”
लेकिन समर्थ रुकने वाला नहीं था।
उसने अपनी जेब से वो ताबीज निकाला।
ताबीज अब तेज़ रोशनी से चमक रहा था।
रघुवीर की आत्मा धीरे से बोली —
“तुम्हारे अंदर वही साहस है…
जो मुझमें कभी नहीं था…”
समर्थ हल्का-सा मुस्कुराया।
“अगर मेरी मौत से सब बच सकते हैं…
तो शायद यही मेरा कर्तव्य है…”
अचानक साया समर्थ की तरफ झपटा।
पूरा कमरा अंधेरे से भर गया।
और उसी पल…
समर्थ ने ताबीज उस काले निशान के बीच फेंक दिया।
तेज़ रोशनी पूरे हवेली में फैल गई।
साया दर्द से चीखने लगा।
घ्राआआआआर्ऱ…!!
अनन्या की आत्मा की आँखों से आँसू बहने लगे।
धीरे-धीरे उसका चेहरा सामान्य होने लगा।
हवेली की दीवारों पर बनी सारी काली आकृतियाँ मिटने लगीं।
लेकिन उसी रोशनी के बीच…
समर्थ का शरीर धीरे-धीरे राख में बदलने लगा।
वीर दौड़ता हुआ उसकी तरफ आया।
“समर्थ…!!
नहीं…!!”
समर्थ ने मुश्किल से मुस्कुराते हुए कहा —
“गाँव…
अब सुरक्षित है…”
और अगले ही पल…
पूरा हवेली एक जोरदार धमाके के साथ रोशनी में डूब गई।
•••
अगली सुबह…
भैरवपुर पूरी तरह शांत था।
कई वर्षों बाद गाँव में डर नहीं था।
पुरानी हवेली हमेशा के लिए जमीन में धँस चुकी थी।
मंदिर की घंटियाँ फिर सामान्य हो गई थीं।
और सबसे अजीब बात…
अनन्या की आत्मा दोबारा कभी दिखाई नहीं दी।
जैसे उसे आखिरकार शांति मिल चुकी हो।
लेकिन गाँव ने अपना सबसे अच्छा इंसान खो दिया था।
समर्थ।
पूरा गाँव उसकी याद में रो रहा था।
वीर ने गाँव के बीच एक बड़ा पत्थर लगवाया…
जिस पर लिखा था —
“मुखिया समर्थ —
जिसने अपने गाँव के लिए अपनी जिंदगी दे दी।”
लोग आज भी कहते हैं…
भैरवपुर की रातों में जब तेज़ हवा चलती है…
तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई अब भी गाँव की रखवाली कर रहा हो।
और मंदिर की घंटियों के बीच…
कभी-कभी एक धीमी आवाज़ सुनाई देती है —
“डरो मत…
मैं यहीं हूँ…”