वापस आई करिश्मा
अध्याय 1: पहली रात की खामोशी
MG Hospital… महात्मा गांधी अस्पताल।
दिन में जहाँ हर तरफ मरीजों की आवाजें, डॉक्टरों की भागदौड़ और मशीनों की बीप-बीप गूंजती रहती थी… वही अस्पताल रात होते ही जैसे किसी और दुनिया में बदल जाता था।
करिश्मा… एक नई नर्स।
अभी-अभी उसने अपनी मेडिकल ट्रेनिंग पूरी की थी और आज उसकी पहली नाइट ड्यूटी थी।
उसने घड़ी देखी — रात के 12:15 बजे।
पूरे कॉरिडोर में सन्नाटा था।
बस हल्की-हल्की ट्यूब लाइट की झिलमिलाहट… और दूर से आती हवा की अजीब सी आवाज।
करिश्मा ने खुद को संभालते हुए सोचा —
“कुछ नहीं है… बस मेरा वहम है।”
तभी पीछे से आवाज आई —
“पहली नाइट ड्यूटी है क्या?”
करिश्मा पलटी…
एक बूढ़ी नर्स खड़ी थी। उसकी आँखें अजीब तरह से गहरी और थकी हुई थीं।
“हां…” करिश्मा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
बूढ़ी नर्स धीरे से बोली —
“रात में वार्ड नंबर 7 के पास मत जाना…”
करिश्मा थोड़ा चौंकी —
“क्यों?”
लेकिन इससे पहले कि वो जवाब देती…
वो नर्स अचानक वहाँ से चली गई… जैसे कभी थी ही नहीं।
करिश्मा के दिल की धड़कन तेज हो गई।
“अजीब लोग हैं…” उसने खुद से कहा और आगे बढ़ गई।
रात के 1:05 बजे…
करिश्मा को एक पेशेंट को दवा देने के लिए वार्ड की तरफ जाना था।
चलते-चलते वो अचानक रुक गई।
उसके सामने एक बोर्ड था —
Ward No. 7
उसे अचानक उस बूढ़ी नर्स की बात याद आई…
“मत जाना…”
करिश्मा ने गहरी सांस ली —
“मैं डॉक्टर हूँ… डरने की कोई बात नहीं।”
वो धीरे-धीरे उस वार्ड के पास पहुंची।
दरवाजा आधा खुला हुआ था…
अंदर पूरी अंधेरा था।
लेकिन…
अंदर से किसी के सांस लेने की आवाज आ रही थी।
धीमी… भारी… और अजीब।
करिश्मा ने हिम्मत करके दरवाजा थोड़ा और खोला।
“कोई है…?” उसने धीरे से पूछा।
कोई जवाब नहीं।
बस… वही सांसों की आवाज।
वो अंदर गई…
और तभी…
उसने देखा —
एक बेड पर कोई लेटा हुआ था… लेकिन उसका चेहरा पूरी तरह छाया में था।
करिश्मा पास गई।
“आपको दवा देनी है…”
जैसे ही उसने हाथ आगे बढ़ाया…
अचानक उस पेशेंट ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
करिश्मा डर के मारे कांप गई।
धीरे-धीरे वो चेहरा रोशनी में आया…
और जो उसने देखा…
उसकी आंखें डर से फैल गईं…
वो चेहरा… इंसान का नहीं था।
आंखें पूरी काली…
चेहरे पर अजीब सी मुस्कान…
और होंठ हिलते हुए बोले —
“तुम… वापस आ गई…”
करिश्मा का दिमाग सुन्न हो गया —
“मैं…? मैं तो पहली बार आई हूँ…”
लेकिन तभी…
उसके कानों में एक फुसफुसाहट गूंजी —
“नहीं… तुम पहले भी यहाँ मर चुकी हो…”
अचानक…
सारे लाइट्स बंद हो गए।
पूरा वार्ड अंधेरे में डूब गया।
और उसी अंधेरे में…
करिश्मा की चीख गूंज उठी…
लेकिन…
उस चीख को सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ… खामोशी।
और वो… सांस लेने की आवाज।
(अध्याय 1 समाप्त)
अध्याय 2: अधूरी यादें
करिश्मा की आँख अचानक खुली…
वो ज़ोर-ज़ोर से सांस ले रही थी।
उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था।
उसने इधर-उधर देखा…
वो अस्पताल के स्टाफ रूम में थी।
“ये… मैं यहाँ कैसे?” उसने खुद से कहा।
उसके हाथ कांप रहे थे। उसे साफ-साफ याद था —
वार्ड नंबर 7… वो अजीब पेशेंट… और वो डरावनी आवाज…
“तुम पहले भी यहाँ मर चुकी हो…”
करिश्मा ने सिर पकड़ लिया —
“नहीं… ये सिर्फ सपना था… हाँ, सपना…”
तभी दरवाज़ा खुला।
एक वार्ड बॉय अंदर आया —
“मैडम, आप ठीक हो? आप यहीं बेहोश मिली थीं…”
करिश्मा चौंक गई —
“बेहोश…?”
“हाँ, करीब 2 बजे। आप वार्ड 7 के बाहर गिरी हुई थीं।”
करिश्मा का दिल एकदम रुक सा गया।
मतलब… ये सपना नहीं था।
सुबह के 4 बजे…
ड्यूटी खत्म होने में अभी समय था, लेकिन करिश्मा का मन अब वहाँ नहीं लग रहा था।
उसने हिम्मत करके एक सीनियर डॉक्टर से पूछा —
“सर… ये वार्ड नंबर 7… हमेशा बंद क्यों रहता है?”
डॉक्टर कुछ पल चुप रहे…
फिर बोले —
“तुम नई हो, इसलिए नहीं जानती… उस वार्ड में 5 साल पहले एक घटना हुई थी।”
करिश्मा की सांसें थम गईं —
“कैसी घटना…?”
डॉक्टर ने धीमी आवाज में कहा —
“एक नर्स थी… बिल्कुल तुम्हारी तरह नई… उसका नाम भी…”
वो रुक गए।
“क्या?” करिश्मा ने घबराकर पूछा।
डॉक्टर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा —
“उसका नाम भी करिश्मा था।”
करिश्मा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“उस रात… उसकी भी नाइट ड्यूटी थी,” डॉक्टर बोले।
“सुबह जब स्टाफ आया… तो वो वार्ड नंबर 7 के अंदर मृत मिली।”
करिश्मा की आँखें भर आईं —
“मृत…?”
“हाँ… लेकिन सबसे अजीब बात ये थी…”
डॉक्टर की आवाज और धीमी हो गई —
“उसके शरीर पर कोई चोट नहीं थी… लेकिन उसके चेहरे पर डर ऐसा था… जैसे उसने कुछ ऐसा देखा हो… जो इंसान नहीं देख सकता।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
करिश्मा का दिमाग तेजी से घूमने लगा।
“लेकिन… उसने मुझे कहा… ‘तुम वापस आ गई’…”
वो खुद से बुदबुदाई।
डॉक्टर ने चौंककर पूछा —
“क्या कहा तुमने?”
करिश्मा ने सब कुछ बता दिया —
वो वार्ड… वो चेहरा… वो आवाज…
डॉक्टर कुछ देर तक चुप रहे…
फिर बोले —
“तुम्हें आज रात फिर ड्यूटी करनी होगी।”
करिश्मा हैरान रह गई —
“क्या…? मैं वहाँ वापस नहीं जाऊँगी!”
डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा —
“अगर तुम सच जानना चाहती हो… तो तुम्हें जाना होगा।”
शाम हो गई…
फिर वही अस्पताल… वही सन्नाटा…
लेकिन इस बार…
करिश्मा डर नहीं रही थी।
उसके अंदर एक सवाल जल रहा था —
“अगर वो नर्स मैं ही थी… तो मैं अब कौन हूँ?”
रात के 12 बजे…
वो फिर से उसी कॉरिडोर में खड़ी थी।
वार्ड नंबर 7…
इस बार दरवाजा पूरी तरह खुला था।
अंदर से हल्की नीली रोशनी आ रही थी।
करिश्मा धीरे-धीरे अंदर गई…
और इस बार…
वो अकेली नहीं थी।
कमरे के बीच में एक आईना रखा था।
करिश्मा उस आईने के पास गई…
और जैसे ही उसने उसमें देखा…
उसकी सांस रुक गई…
आईने में जो चेहरा था…
वो उसका नहीं था।
वो उसी मरी हुई नर्स का चेहरा था…
जिसकी आँखें खाली थीं…
और होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे —
“अब… तुम्हारी बारी है…”
अचानक…
आईने में खड़ा वो चेहरा मुस्कुराया…
और करिश्मा ने महसूस किया…
जैसे कोई उसके अंदर घुस रहा हो…
उसकी यादें… उसका शरीर… सब कुछ बदल रहा था…
और उसी पल…
कॉरिडोर में एक नई नर्स आई…
उसका नाम था — करिश्मा।
(अध्याय 2 समाप्त)
अध्याय 3: आईने के पीछे की सच्चाई
करिश्मा का शरीर वहीं खड़ा था…
लेकिन उसके अंदर कुछ बदल चुका था।
उसकी सांसें अब सामान्य नहीं थीं…
धीमी… भारी… और अजीब।
उसने फिर से आईने में देखा।
इस बार… चेहरा उसका ही था।
“तो… ये सब मेरा वहम था?” उसने खुद से कहा।
लेकिन तभी…
आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुराया…
जबकि उसके असली चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
करिश्मा का दिल जोर से धड़कने लगा।
“ये… ये कैसे…?”
आईने के अंदर खड़ी ‘दूसरी करिश्मा’ धीरे-धीरे बोली —
“तुम समझ नहीं रही… तुम यहाँ आई नहीं हो…”
“तुम्हें यहाँ बुलाया गया है…”
अचानक…
कमरे की दीवारों पर पुराने निशान उभरने लगे।
खरोंचें… खून जैसे सूखे दाग…
और कुछ अजीब चिन्ह (symbols)।
करिश्मा पीछे हटने लगी।
“ये सब क्या है…?”
आईने वाली आवाज फिर आई —
“ये जगह… याद रखती है…”
“जो यहाँ मरते हैं… वो कभी जाते नहीं…”
करिश्मा को अचानक सिर में तेज दर्द हुआ।
जैसे कोई पुरानी याद जबरदस्ती वापस आ रही हो।
कुछ टुकड़े… धुंधले…
एक लड़की… सफेद नर्स ड्रेस में…
वो रो रही है…
वो चिल्ला रही है —
“मुझे यहाँ से जाने दो… प्लीज…”
और सामने…
एक वही डरावना चेहरा…
काली आँखें… अजीब मुस्कान…
करिश्मा अचानक चीख उठी —
“ये मैं हूँ…!”
उसके घुटने जमीन पर गिर गए।
“मैं… वही नर्स हूँ…”
आईने से आवाज आई —
“हाँ… तुम वही हो…”
“हर 5 साल में… ये जगह एक नई आत्मा को बुलाती है…”
“और पुरानी आत्मा को… आज़ाद करती है…”
करिश्मा का दिमाग सुन्न हो गया —
“मतलब… मैं… मर चुकी हूँ…?”
आईने में खड़ी ‘वो’ मुस्कुराई —
“तुम 5 साल पहले ही मर चुकी थी…”
“अब तक… तुम बस एक खाली शरीर थी…”
तभी…
अचानक दरवाज़ा जोर से बंद हो गया।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
और उसी अंधेरे में…
वो काली आँखों वाला चेहरा फिर से सामने आ गया।
इस बार… और करीब…
इतना करीब… कि उसकी ठंडी सांस करिश्मा के चेहरे को छू रही थी।
वो धीरे से बोला —
“तुमने मुझे छोड़ने की कोशिश की थी…”
“लेकिन अब… तुम मेरी हो…”
करिश्मा रोने लगी —
“नहीं… प्लीज… मुझे जाने दो…”
लेकिन उस आवाज में अब डर कम था…
और एक अजीब सी सच्चाई ज्यादा।
अचानक…
उसके सामने वही सीन फिर से दोहराया गया —
वो पहली रात…
वो वार्ड…
वो डर…
लेकिन इस बार…
उसने देखा —
उस रात… वो अकेली नहीं थी।
वहाँ एक और नर्स थी…
बिल्कुल उसकी तरह…
जो उसे देख रही थी…
और मुस्कुरा रही थी।
करिश्मा की आँखें फैल गईं —
“मतलब… उस रात… मैं किसी और की जगह आई थी…”
आईने से आवाज आई —
“और अब… कोई और तुम्हारी जगह लेने आ चुका है…”
करिश्मा अचानक समझ गई —
“तो मैं… कभी बाहर नहीं जा पाऊँगी…?”
कमरे में गूंजती आवाज आई —
“नहीं…”
“तुम अब… इस जगह की याद बन चुकी हो…”
अचानक…
उसका शरीर धीरे-धीरे धुंधला होने लगा।
जैसे वो हवा में घुल रही हो…
और उसी वक्त…
अस्पताल के गेट पर…
एक नई नर्स खड़ी थी…
हाथ में जॉइनिंग लेटर…
नाम — करिश्मा।
और उसकी आँखों में…
एक अजीब सी पहचान थी…
जैसे वो पहले भी यहाँ आ चुकी हो…
(अध्याय 3 समाप्त)
अध्याय 4: अंत… जो कभी खत्म नहीं होता
अस्पताल का गेट…
रात के ठीक 11:58 बजे।
नई नर्स… करिश्मा… धीरे-धीरे अंदर आई।
हाथ में जॉइनिंग लेटर… आँखों में हल्की घबराहट…
और दिल में एक अजीब सा एहसास —
“मैं पहले भी यहाँ आ चुकी हूँ…”
रिसेप्शन पर बैठे गार्ड ने बिना उसकी तरफ देखे कहा —
“पहली नाइट ड्यूटी है?”
करिश्मा चौंकी…
“जी…”
गार्ड हल्का सा मुस्कुराया —
“वार्ड नंबर 7 से दूर रहना…”
करिश्मा का दिल तेज धड़कने लगा।
“ये सब… इतना जाना-पहचाना क्यों लग रहा है…?”
रात के 12:20…
वो कॉरिडोर में चल रही थी।
वही झिलमिलाती लाइट… वही सन्नाटा…
और वही ठंडी हवा…
अचानक…
उसे सामने एक लड़की दिखाई दी।
नर्स की ड्रेस में…
पीठ उसकी तरफ थी।
“सुनिए…” करिश्मा ने आवाज दी।
वो लड़की धीरे-धीरे मुड़ी…
और जैसे ही उसका चेहरा दिखा…
करिश्मा के कदम वहीं जम गए।
वो चेहरा…
उसका अपना था।
लेकिन वो “वो” नहीं थी…
वो कोई और थी…
जिसकी आँखों में दर्द था…
और होंठों पर एक थकी हुई मुस्कान।
वो धीरे से बोली —
“डरो मत…”
“मैं भी कभी तुम्हारी जगह थी…”
करिश्मा की आवाज कांप गई —
“तुम… कौन हो…?”
वो मुस्कुराई —
“मैं… वो हूँ जो तुम बनने वाली हो…”
अचानक…
कॉरिडोर की सारी लाइट्स एक साथ बंद हो गईं।
पूरा अस्पताल अंधेरे में डूब गया।
और उसी अंधेरे में…
सैकड़ों फुसफुसाहटें गूंजने लगीं —
“आ गई…”
“नई आ गई…”
“अब ये यहीं रहेगी…”
करिश्मा डर के मारे पीछे हटने लगी।
लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धंस गए थे।
तभी…
वार्ड नंबर 7 का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर से वही नीली रोशनी बाहर आने लगी।
उस “दूसरी करिश्मा” ने उसका हाथ पकड़ा…
इस बार पकड़ ठंडी नहीं थी…
बल्कि भारी थी…
जैसे सालों का दर्द उसमें भरा हो।
“चलो…” उसने धीरे से कहा।
“नहीं… मैं नहीं जाऊँगी…” करिश्मा रोने लगी।
वो मुस्कुराई —
“मैं भी यही बोली थी…”
धीरे-धीरे…
वो उसे खींचकर वार्ड के अंदर ले गई।
कमरे के बीच में वही आईना रखा था।
लेकिन इस बार…
आईने में सिर्फ एक चेहरा नहीं था…
बल्कि…
दर्जनों चेहरे थे…
हर एक… एक नर्स…
हर एक… डरी हुई…
हर एक… कैद…
और उन सबके बीच…
सबसे पीछे…
वो पहली करिश्मा खड़ी थी…
जो 5 साल पहले मरी थी।
उसने धीरे से कहा —
“अब… तुम हमारी जगह ले रही हो…”
करिश्मा चीख पड़ी —
“नहीं… मैं यहाँ नहीं रह सकती…!”
तभी…
वो काली आँखों वाला चेहरा फिर सामने आया…
इस बार और विशाल…
और डरावना…
वो हँसते हुए बोला —
“ये जगह… किसी को जाने नहीं देती…”
“यहाँ हर आत्मा… एक कहानी बन जाती है…”
करिश्मा रोते हुए बोली —
“लेकिन क्यों…?”
कुछ पल के लिए…
वो चेहरा शांत हो गया…
और धीरे से बोला —
“क्योंकि… ये अस्पताल नहीं है…”
“ये एक याद है…”
“उन लोगों की… जिन्हें यहाँ भुला दिया गया…”
पूरा कमरा कांपने लगा…
और अचानक…
करिश्मा का शरीर जम गया।
उसकी आँखें धीरे-धीरे खाली होने लगीं…
और उसके होंठ अपने आप मुस्कुराने लगे…
अब…
वो भी उस आईने का हिस्सा बन चुकी थी।
अगली सुबह…
अस्पताल बिल्कुल सामान्य था।
डॉक्टर… मरीज… आवाजें…
सब कुछ वैसा ही।
और नोटिस बोर्ड पर…
एक नई नर्स का नाम लिखा था —
करिश्मा
लेकिन…
उसके नीचे एक और नाम था…
जो धीरे-धीरे मिट रहा था…
करिश्मा (5 साल पहले)
कॉरिडोर में चलते हुए…
अगर कोई ध्यान से सुनता…
तो उसे आज भी एक धीमी आवाज सुनाई देती —
“मत आना… वार्ड नंबर 7 में…”
लेकिन…
कोई सुनता नहीं।
क्योंकि…
कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं…
वो बस…
दोहराई जाती हैं।
(कहानी समाप्त)
