दिल, धोखा और खामोशी
अध्याय 1: हँसी के पीछे छुपा साया
(सीन: गोवा का बीच, शाम का समय, हल्की हवा, सब दोस्त हँसते हुए)
आरव: यार, सच बताऊँ… अगर जिंदगी में कभी सुकून मिला है ना, तो वो अभी है।
कबीर: बिल्कुल! ना कॉलेज का टेंशन, ना घर वालों का… बस हम और ये समंदर।
रोहन (हँसते हुए): और सबसे बड़ी बात… हमारे साथ Yashika है।
यशिका (मुस्कुराते हुए): ओह प्लीज, तुम लोग मुझे ऐसे मत देखो जैसे मैं कोई हीरोइन हूँ।
सिया: हीरोइन नहीं… उससे भी ज्यादा। तू जहाँ जाती है, वहाँ सबका ध्यान खींच लेती है।
नैना (धीमे स्वर में): हाँ… सबका।
(यशिका और नैना की आँखें एक पल के लिए मिलती हैं, लेकिन तुरंत दोनों नजरें हटा लेती हैं)
कबीर: चलो, आज रात पार्टी करते हैं! फुल म्यूजिक, डांस और… कुछ सीक्रेट बातें भी।
आरव: सीक्रेट बातें? ओहो… लगता है आज कोई राज खुलेगा।
यशिका (हँसते हुए): राज सबके होते हैं… बस वक्त आने पर ही खुलते हैं।
(सीन शिफ्ट: रात, वही विला जहाँ सब रुके हैं)
रोहन: यार ये विला तो कमाल का है… थोड़ा डरावना जरूर है, लेकिन मजा आ रहा है।
सिया: डरावना? मुझे तो कुछ अजीब सा लग रहा है यहाँ।
यशिका: डर मत, मैं हूँ ना।
(यशिका सिया का हाथ पकड़ती है)
(रात थोड़ी और गहरी हो जाती है)
आरव (धीरे से यशिका से): यार… मैं कब से तुझसे कुछ कहना चाहता था।
यशिका: क्या?
आरव: मुझे तू पसंद है… बहुत ज्यादा।
(थोड़ी देर के लिए सन्नाटा)
यशिका (मुस्कुराते हुए): मुझे पता था।
आरव (खुश होकर): सच में?
यशिका: हाँ… और मुझे भी तू अच्छा लगता है।
(कुछ देर बाद)
कबीर (यशिका के पास आते हुए): यशिका, क्या मैं तुझसे कुछ पर्सनल पूछ सकता हूँ?
यशिका (हल्के अंदाज़ में): पूछो ना… आज सब कुछ खुला है।
कबीर: क्या तू किसी से प्यार करती है?
(यशिका एक पल के लिए चुप हो जाती है… फिर मुस्कुरा देती है)
यशिका: शायद… और शायद नहीं भी।
(सीन: रात 1 बजे, सब अपने-अपने कमरों में जाने लगते हैं)
नैना (धीरे से): यशिका… एक मिनट।
यशिका: हाँ?
नैना: क्या हम बात कर सकते हैं… अकेले?
(दोनों एक कमरे की ओर जाते हैं… दरवाज़ा धीरे से बंद हो जाता है)
(बाहर हॉल में)
रोहन: यार, मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा।
सिया: क्यों?
रोहन: पता नहीं… जैसे कुछ होने वाला है।
(अचानक… अंदर से हल्की आवाज़ आती है… जैसे किसी चीज़ के गिरने की)
सिया: ये क्या था?
आरव: शायद कुछ नहीं… हवा होगी।
(कुछ मिनट बाद… दरवाज़ा खुलता है)
नैना बाहर आती है… उसका चेहरा बिल्कुल शांत है।
आरव: यशिका कहाँ है?
नैना: वो… अंदर है। सो रही है।
(अगले दिन… पुलिस उसी विला के बाहर खड़ी होगी… और एक ऐसी कहानी शुरू होगी, जिसमें हर किसी का सच सामने आएगा…)
अध्याय 1 समाप्त
अध्याय 2: सवालों का जाल
(सीन: अगली सुबह, विला के बाहर पुलिस की गाड़ी रुकती है)
इंस्पेक्टर शर्मा: सब लोग बाहर आ जाइए… किसी ने पुलिस को कॉल किया था।
(सभी दोस्त एक-एक करके बाहर आते हैं, चेहरे पर डर साफ दिखाई देता है)
आरव: सर… वो… यशिका… वो उठ नहीं रही।
इंस्पेक्टर शर्मा (गंभीर स्वर में): कब से?
सिया: सुबह हमने दरवाज़ा खोला… तो वो बेड पर पड़ी थी… बिल्कुल शांत।
कबीर: हमने सोचा वो सो रही है… लेकिन जब हिलाया तो…
(सिया रोने लगती है)
इंस्पेक्टर शर्मा: ठीक है। कोई अंदर नहीं जाएगा अब। पहले हमें देखने दीजिए।
(सीन: कमरे के अंदर, यशिका बेड पर पड़ी है, माहौल भारी और खामोश)
कॉन्स्टेबल: सर… ये तो…
इंस्पेक्टर शर्मा: हाँ… मामला सीधा नहीं लग रहा।
(इंस्पेक्टर पूरे कमरे को ध्यान से देखता है—टेबल पर आधा भरा ग्लास, फर्श पर गिरा हुआ कुर्सी का कोना, और खिड़की हल्की खुली)
(सीन: हॉल में सभी से पूछताछ शुरू)
इंस्पेक्टर शर्मा: एक-एक करके सब बताएँगे… रात को क्या हुआ था। कोई भी बात छुपाने की कोशिश मत करना।
इंस्पेक्टर शर्मा: सबसे पहले… तुम। (आरव की ओर इशारा करते हुए) नाम?
आरव: आरव।
इंस्पेक्टर: तुम यशिका के कितने करीब थे?
आरव (हिचकते हुए): हम… अच्छे दोस्त थे।
इंस्पेक्टर: सिर्फ दोस्त?
(आरव कुछ सेकंड चुप रहता है)
आरव: नहीं… मैं उसे पसंद करता था। कल रात मैंने उसे बताया भी था।
इंस्पेक्टर: और उसने क्या कहा?
आरव: उसने… हाँ कहा।
(बाकी सब चौंक कर आरव की ओर देखते हैं)
इंस्पेक्टर: अच्छा। अब तुम। (कबीर की तरफ देखते हुए)
कबीर: मेरा नाम कबीर है।
इंस्पेक्टर: तुम्हारा और यशिका का रिश्ता?
कबीर: हम… क्लोज थे। मतलब… मैं भी उसे पसंद करता था।
इंस्पेक्टर: क्या तुमने उसे बताया?
कबीर: हाँ… और उसने मुझे साफ जवाब नहीं दिया।
इंस्पेक्टर (धीरे से मुस्कुराते हुए): दिलचस्प… एक ही लड़की, और दो अलग जवाब।
इंस्पेक्टर: अब तुम। (रोहन की तरफ)
रोहन: सर… मैं कुछ नहीं छुपाऊंगा। मैं भी उसे पसंद करता था।
इंस्पेक्टर: और उसने?
रोहन: वो मेरे साथ भी… बहुत करीब थी।
(कमरे में सन्नाटा छा जाता है)
इंस्पेक्टर शर्मा: मतलब… तीनों को अलग-अलग उम्मीदें दी गई थीं।
(सभी एक-दूसरे को शक की नजर से देखने लगते हैं)
इंस्पेक्टर: अब लड़कियों से बात करते हैं।
सिया: सर, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा… वो सबके साथ ऐसा क्यों कर रही थी?
इंस्पेक्टर: यही तो हमें पता लगाना है।
इंस्पेक्टर (नैना की ओर देखते हुए): तुम्हारा नाम?
नैना: नैना।
इंस्पेक्टर: तुम आखिरी बार यशिका के साथ कब थीं?
नैना: रात को… करीब एक बजे।
इंस्पेक्टर: क्या बात हुई?
नैना: बस… नॉर्मल बातें।
इंस्पेक्टर: कोई झगड़ा?
नैना: नहीं।
(इंस्पेक्टर कुछ देर तक नैना को गौर से देखता है, जैसे उसकी आँखों में कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहा हो)
इंस्पेक्टर: तुम सबमें से कोई ना कोई सच छुपा रहा है। और सच यही है कि ये कोई हादसा नहीं… ये एक प्लान था।
(सभी के चेहरे पर डर और शक बढ़ जाता है)
(सीन: इंस्पेक्टर कमरे से बाहर निकलता है और कॉन्स्टेबल से धीरे से कहता है)
इंस्पेक्टर शर्मा: सबके फोन जब्त करो… और कॉल डिटेल निकालो। ये मामला दिल का भी है… और दिमाग का भी।
(वॉइसओवर जैसा माहौल)
उस रात क्या हुआ था…
किसने सच बोला, किसने झूठ…
और किसने अपने दिल के दर्द को छुपाकर एक खतरनाक कदम उठाया…
सच अभी बहुत दूर था।
अध्याय 2 समाप्त
अध्याय 3: अधूरे रिश्तों का सच
(सीन: हॉल, सभी बैठे हैं… माहौल पहले से ज्यादा भारी है)
इंस्पेक्टर शर्मा: अब तक जो सामने आया है… उससे साफ है कि यशिका सबकी जिंदगी में अलग-अलग जगह रखती थी। लेकिन असली सच अभी भी छुपा हुआ है।
(इंस्पेक्टर रोहन की तरफ देखता है)
इंस्पेक्टर: तुम… तुमने कहा था कि वो तुम्हारे करीब थी। कितना करीब?
(रोहन गहरी सांस लेता है… जैसे सालों से दबा हुआ राज बाहर आने वाला हो)
रोहन: सर… ये बात आज तक मैंने किसी को नहीं बताई।
(बाकी सब उसकी तरफ देखने लगते हैं)
रोहन: कई साल पहले… यशिका मेरी गर्लफ्रेंड थी।
(सभी चौंक जाते हैं)
आरव: क्या…?
कबीर: तूने कभी बताया क्यों नहीं?
रोहन: क्योंकि… उसने मना किया था।
इंस्पेक्टर: आगे बोलो।
रोहन: हम दोनों बहुत करीब थे… इतना कि हमने एक साथ एक ही कमरे में रात बिताई थी। उस वक्त मैं नशे में था… और सब कुछ धुंधला सा था।
(कमरे में सन्नाटा छा जाता है)
रोहन: अगले दिन जब मैंने उससे बात की… तो उसने कहा कि जो हुआ उसे भूल जाओ। जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
इंस्पेक्टर: और तुमने मान लिया?
रोहन (कड़वाहट के साथ): नहीं… मैं कैसे भूलता? मैं उससे प्यार करने लगा था। बहुत ज्यादा।
सिया: फिर…?
रोहन: फिर मैंने उसे कई बार पूछा… रिश्ता आगे बढ़ाने के लिए। लेकिन हर बार वो टाल देती थी। कभी हाँ नहीं कहा… लेकिन दूर भी नहीं गई।
कबीर: मतलब… वो तुम्हें भी उम्मीद देती रही?
रोहन: हाँ… जैसे वो तुम दोनों के साथ कर रही थी।
(अब सबकी नजरें एक-दूसरे पर शक से घूमने लगती हैं)
आरव (गुस्से में): मतलब हम तीनों के साथ खेल रही थी वो?
कबीर: ये सब… पहले क्यों नहीं बताया?
रोहन: क्योंकि मैं खुद समझ नहीं पाया… कि वो आखिर चाहती क्या थी।
(इंस्पेक्टर शर्मा धीरे-धीरे चलते हुए सबकी बातें सुन रहा है)
इंस्पेक्टर: दिलचस्प… बहुत दिलचस्प।
इंस्पेक्टर: एक लड़की… तीन लड़के… और तीनों को अलग-अलग कहानी।
(वो नैना और सिया की तरफ भी देखता है)
इंस्पेक्टर: और तुम दोनों? तुम लोगों को ये सब पता था?
सिया: नहीं सर… मुझे तो कुछ भी नहीं पता था।
इंस्पेक्टर (नैना से): और तुम्हें?
नैना (शांत स्वर में): नहीं… मुझे भी नहीं।
(इंस्पेक्टर उसकी आँखों में देखता है, लेकिन इस बार कुछ समझ नहीं पाता)
(सीन: इंस्पेक्टर कमरे में वापस जाता है, जहाँ यशिका की बॉडी है)
वो टेबल पर रखा गिलास उठाता है… सूंघता है…
इंस्पेक्टर शर्मा (धीरे से): नशा… लेकिन किसने दिया?
(वॉइसओवर जैसा माहौल)
यशिका के अतीत की परतें खुल रही थीं…
हर किसी के पास एक कहानी थी…
हर कहानी में प्यार था… लेकिन साथ में दर्द और धोखा भी।
लेकिन सवाल अभी भी वही था—
उस रात आखिरी बार यशिका के साथ क्या हुआ था?
और सबसे बड़ा सवाल…
क्या ये सिर्फ दिल टूटने की कहानी है… या कुछ और भी गहरा?
(सीन: बाहर, सभी अलग-अलग कोनों में खड़े हैं… अब कोई किसी पर भरोसा नहीं कर रहा)
आरव (धीरे से कबीर से): यार… कहीं ये सब उसी ने तो नहीं किया?
कबीर: या फिर… हम में से किसी ने।
सच अब और उलझ चुका था।
अध्याय 3 समाप्त
अध्याय 4: फोन में छुपा सच
(सीन: विला के हॉल में सभी मौजूद हैं, इंस्पेक्टर के हाथ में यशिका का फोन)
इंस्पेक्टर शर्मा: हमने यशिका का फोन चेक किया है।
(सभी एकदम ध्यान से उसकी तरफ देखने लगते हैं)
आरव: कुछ मिला सर?
इंस्पेक्टर: मिला… लेकिन जो मिला, वो और ज्यादा सवाल खड़े करता है।
कबीर: मतलब?
इंस्पेक्टर (फोन दिखाते हुए): इसके फोन में… सिर्फ लड़कियों की तस्वीरें हैं।
(सभी चौंक जाते हैं)
सिया: सिर्फ लड़कियाँ?
इंस्पेक्टर: हाँ। इंस्टाग्राम, गैलरी… हर जगह। एक भी लड़के की फोटो नहीं।
रोहन: लेकिन… ये कैसे हो सकता है? वो तो…
(वो बात अधूरी छोड़ देता है)
इंस्पेक्टर: और सबसे अजीब बात… इसके सारे चैट्स डिलीट हैं। व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम… सब साफ।
आरव: मतलब… किसी ने जानबूझकर सब हटाया है?
इंस्पेक्टर: या फिर… खुद यशिका ने।
(कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा फैल जाता है)
सिया: सर… क्या वो किसी लड़की के साथ…?
इंस्पेक्टर (रुककर): अभी हम कुछ कन्फर्म नहीं कह सकते। लेकिन इतना जरूर है कि उसकी जिंदगी का एक हिस्सा ऐसा था… जो तुम लोगों से छुपा हुआ था।
(नैना चुपचाप बैठी है… उसका चेहरा समझना मुश्किल है)
इंस्पेक्टर: मुझे ये भी जानना है कि… तुम लोगों में से किसी को उसके इस साइड के बारे में कुछ पता था या नहीं।
आरव: नहीं सर… उसने कभी ऐसा कुछ नहीं बताया।
कबीर: मुझे भी नहीं।
रोहन: मुझे तो लगता था… वो सिर्फ हमसे ही… जुड़ी हुई है।
(इंस्पेक्टर धीरे-धीरे कमरे में टहलता है)
इंस्पेक्टर: एक लड़की… जो तीन लड़कों के साथ अलग-अलग रिश्ते निभा रही थी… और उसके फोन में सिर्फ लड़कियों की दुनिया।
(वो रुकता है… और गहरी नजर से सबको देखता है)
इंस्पेक्टर: कहानी जितनी दिख रही है… उससे कहीं ज्यादा उलझी हुई है।
(सीन: इंस्पेक्टर फोन में एक फोटो खोलता है)
उस फोटो में यशिका किसी लड़की के साथ बहुत करीब खड़ी है… दोनों के चेहरों पर अजीब सी मुस्कान।
इंस्पेक्टर (धीरे से): ये लड़की कौन है?
(सभी उस फोटो को देखते हैं… लेकिन कोई जवाब नहीं देता)
सिया: मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा।
आरव: मुझे भी याद नहीं।
(इंस्पेक्टर फोन लॉक करता है)
इंस्पेक्टर: ठीक है… अब एक बात साफ है।
इंस्पेक्टर (सख्त आवाज़ में): यशिका सिर्फ वही नहीं थी… जो तुम लोग सोचते थे।
(वॉइसओवर जैसा माहौल)
उसके फोन ने एक नया दरवाज़ा खोल दिया था…
एक ऐसी दुनिया का… जहाँ वो शायद सच में खुद थी।
लेकिन उस दुनिया में कौन था?
किससे वो अपनी असली बातें करती थी?
और क्यों उसने सब कुछ मिटा दिया?
(सीन: बाहर, समंदर की लहरें तेज हो रही हैं… जैसे कोई तूफान आने वाला हो)
अब कहानी सिर्फ धोखे की नहीं रही…
ये पहचान और छुपे हुए सच की बन चुकी थी।
सच और करीब आ रहा था…
लेकिन हर कदम के साथ, रास्ता और धुंधला होता जा रहा था।
अध्याय 4 समाप्त
अध्याय 5: सच का जाल
(सीन: पुलिस स्टेशन के बाहर)
इंस्पेक्टर शर्मा: देखो… जितना हमने देखा है, उससे यही लग रहा है कि ये मामला बाहर के किसी इंसान का है। तुम लोगों पर शक करना अभी सही नहीं होगा।
(सभी थोड़ा राहत की सांस लेते हैं)
आरव: मतलब… हम जा सकते हैं?
इंस्पेक्टर: हाँ। लेकिन शहर छोड़ने की कोशिश मत करना। और हाँ… आज रात मेरे घर एक छोटी सी पार्टी है। मेरा जन्मदिन है… तुम सब आना।
(सीन: रात, इंस्पेक्टर शर्मा का घर, हल्का म्यूजिक, सब मौजूद हैं)
कबीर (धीरे से): अजीब है ना… सुबह तक हम सब शक के घेरे में थे… और अब पार्टी में हैं।
रोहन: शायद सच में पुलिस को लगता है कि कातिल कोई और है।
(इंस्पेक्टर सबको ड्रिंक देता है)
इंस्पेक्टर: रिलैक्स करो… बहुत तनाव हो गया है तुम सब पर।
(सभी ड्रिंक लेते हैं… धीरे-धीरे माहौल बदलने लगता है)
(कुछ देर बाद…)
सिया (आँखों में आँसू): यार… यशिका क्यों…?
आरव (टूटी आवाज़ में): उसने सबके साथ खेला… लेकिन फिर भी… वो हमारी थी।
कबीर: हाँ… शायद हम सब उसे सच में चाहते थे।
(नैना एक कोने में बैठी है… उसकी आँखें भीगने लगती हैं)
रोहन (धीरे से): तू कुछ बोल क्यों नहीं रही?
(नैना अचानक बोल पड़ती है… उसकी आवाज़ भारी हो चुकी है)
नैना: क्योंकि… सच सुनने की हिम्मत नहीं है तुम लोगों में।
(सभी उसकी तरफ देखते हैं)
आरव: क्या मतलब?
(नैना हँसती है… लेकिन उस हँसी में दर्द है)
नैना: तुम लोग उसे चाहते थे… लेकिन जानते नहीं थे।
कबीर: और तू जानती थी?
(कुछ सेकंड की खामोशी)
नैना: हाँ… मैं जानती थी।
सिया: क्या जानती थी?
नैना (धीरे-धीरे): कि वो… जैसी दिखती थी… वैसी थी नहीं।
(सभी ध्यान से सुन रहे हैं… नशे का असर बढ़ रहा है, लेकिन दिमाग सच सुनना चाहता है)
नैना: वो तुम तीनों के साथ खेल रही थी… क्योंकि वो खुद से भाग रही थी।
रोहन: साफ-साफ बोल!
(नैना की आँखों से आँसू बहने लगते हैं)
नैना: वो… लड़कों से नहीं… लड़कियों से जुड़ी हुई थी।
(कमरे में सन्नाटा)
आरव: क्या…?
नैना: हाँ… और वो मुझसे भी झूठ बोल रही थी।
कबीर: मतलब… तुम दोनों…?
नैना (आँखें बंद करके): हाँ… मैं उससे जुड़ी हुई थी… दिल से।
(सभी स्तब्ध)
सिया: फिर…?
नैना (कंपती आवाज़ में): फिर मुझे पता चला कि वो सिर्फ मेरे साथ नहीं… और भी लड़कियों से जुड़ी हुई थी। जैसे तुम लोगों के साथ खेल रही थी… वैसे ही वहाँ भी।
रोहन: तो तूने…?
(नैना सिर झुका लेती है)
नैना: हाँ… मैंने ही उसकी ज़िंदगी का अंत किया।
(सन्नाटा… किसी के पास शब्द नहीं)
आरव: क्यों…?
(नैना की आवाज़ टूट जाती है)
नैना: क्योंकि उस रात… मैंने उससे सच माँगा था। सिर्फ एक सच… कि वो आखिर है क्या।
(फ्लैशबैक जैसा माहौल)
कमरा बंद था… दोनों आमने-सामने खड़ी थीं।
नैना: तू आखिर चाहती क्या है?
यशिका: मैं… खुद नहीं जानती।
नैना: तूने मुझे भी धोखा दिया।
यशिका (शांत स्वर में): मैं किसी की नहीं हूँ… ना तेरी, ना उनकी।
(ये सुनकर नैना का दिल टूट जाता है)
नैना (वर्तमान में): उसने मुझे धक्का दिया… और सब खत्म करने को कहा।
(वो रुकती है… गहरी सांस लेती है)
नैना: गुस्से में… दर्द में… मैंने टेबल पर रखा ग्लास उठाया… उसमें पहले से कुछ मिला हुआ था… जो शायद उसने खुद के लिए रखा था या किसी और के लिए…
मैंने वही उसे दे दिया… और वो कुछ ही देर में… शांत हो गई।
(कमरे में भारी सन्नाटा)
(सीन कट: सुबह, सब धीरे-धीरे होश में आते हैं)
(पुलिस स्टेशन)
इंस्पेक्टर शर्मा: अब सबको पता चल गया है… कातिल कौन है।
(सभी हैरान)
आरव: आपको कैसे…?
इंस्पेक्टर: क्योंकि कल रात की पार्टी… सिर्फ पार्टी नहीं थी।
कबीर: मतलब?
इंस्पेक्टर: तुम सबके ड्रिंक में एक ऐसा पदार्थ मिलाया गया था… जिससे सच छुप नहीं पाता।
(सभी चौंक जाते हैं)
इंस्पेक्टर: और नैना… तुमने खुद सब बता दिया।
(नैना चुपचाप खड़ी रहती है)
इंस्पेक्टर (धीरे से): कभी-कभी… सबसे खतरनाक हथियार ना गुस्सा होता है… ना नफरत… बल्कि टूटा हुआ दिल होता है।
(नैना की आँखों से आँसू गिरते हैं… लेकिन इस बार वो शांत है)
सच सामने आ चुका था…
प्यार, धोखा और पहचान के बीच फंसी एक कहानी…
जिसका अंत… किसी ने सोचा भी नहीं था।
अध्याय 5 समाप्त
अध्याय 6: आखिरी सच
(सीन: पुलिस स्टेशन, सभी मौजूद… माहौल भारी और चुप्पी से भरा)
इंस्पेक्टर शर्मा: नैना… क्या तुम अपने बयान पर कायम हो?
(नैना सिर उठाती है… उसकी आँखों में थकान और टूटन साफ है)
नैना: हाँ… मैंने ही उसे वो पानी दिया था।
(सभी की नजरें उसी पर टिक जाती हैं)
आरव (गुस्से में): क्यों किया तूने ऐसा?
नैना (टूटी आवाज़ में): मैंने उसे मारने के लिए नहीं किया था…
कबीर: तो फिर?
नैना: मैं बस… उसे सच बताना चाहती थी… उसे रोकना चाहती थी… लेकिन वो खुद ही टूट चुकी थी।
इंस्पेक्टर: साफ-साफ बताओ।
नैना: उस रात… वो पहले से ही कुछ मिला रही थी उस पानी में… मैं समझ नहीं पाई क्या।
मैंने गुस्से में वही गिलास उठाया… और उसे दे दिया।
सिया: मतलब… तुझे नहीं पता था उसमें क्या है?
नैना (रोते हुए): नहीं… अगर पता होता… तो मैं कभी नहीं देती।
(सन्नाटा… लेकिन अब कोई उसकी बात पर भरोसा नहीं करता)
आरव: झूठ बोल रही है तू!
कबीर: सबके सामने मान भी लिया… और अब कह रही है कि इरादा नहीं था?
इंस्पेक्टर शर्मा (सख्ती से): बस! सच कोर्ट में तय होगा। अभी के लिए… नैना, तुम्हें हमारे साथ चलना होगा।
(दो पुलिसवाले नैना को पकड़ते हैं… वो पीछे मुड़कर सबको देखती है)
नैना (धीरे से): मैंने उसे खोया है… तुम लोगों ने नहीं समझा उसे…
(उसे पुलिस गाड़ी में बैठा दिया जाता है… गाड़ी धीरे-धीरे दूर चली जाती है)
(सीन: बाकी सभी चुप खड़े हैं… कोई कुछ नहीं बोलता)
(एक कोने में… रोहन खड़ा है)
उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान है…
रोहन (धीरे-धीरे, खुद से): यशिका… तू मुझे ठुकरा रही थी…
क्योंकि तू अलग थी…
(वो हल्का सा हँसता है)
रोहन: अच्छा हुआ… मैंने ही उस पानी में जहर मिला दिया था।
(उसकी आँखों में ठंडापन है… कोई पछतावा नहीं)
रोहन: सबको लगा… सच सामने आ गया…
लेकिन असली खेल… कोई समझ ही नहीं पाया।
(वो धीरे-धीरे वहां से चला जाता है… जैसे कुछ हुआ ही नहीं)
(वॉइसओवर जैसा माहौल)
कभी-कभी सच… वो नहीं होता जो सामने दिखता है…
और कातिल… वो नहीं होता जिस पर उंगली उठती है।
एक झूठ… कई जिंदगियाँ बर्बाद कर देता है।
गोवा की वो रात…
अब सिर्फ एक केस नहीं रही…
बल्कि एक ऐसा राज बन गई…
जो हमेशा अधूरा ही रहेगा।
कहानी समाप्त
