कश्मीर का खौफनाक विला
अध्याय 1: सफर की शुरुआत
कश्मीर की वादियों में ठंडी हवा कुछ अलग ही कहानी सुनाती है…
चार दोस्त — कृष्णा, आरव, कबीर और नील — अपने कॉलेज के दिनों के सबसे करीब दोस्त थे। जिंदगी की भागदौड़ में सब अलग हो चुके थे, लेकिन इस बार उन्होंने तय किया कि वो फिर से साथ वक्त बिताएंगे… और जगह चुनी — कश्मीर।
"भाई, इस बार कुछ ऐसा करेंगे जो जिंदगी भर याद रहे!" — आरव ने ट्रेन में बैठते ही कहा।
कृष्णा खिड़की से बाहर देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ बोला,
"बस इस बार… सब कुछ सही रहना चाहिए…"
उसके इस वाक्य में एक अजीब सा वजन था… जैसे वो कुछ छुपा रहा हो।
नील ने मजाक उड़ाते हुए कहा,
"तू हमेशा इतना serious क्यों रहता है यार? ये trip है, funeral नहीं!"
सब हंस पड़े… लेकिन कृष्णा की आंखों में वो हंसी नहीं थी।
जैसे-जैसे वो कश्मीर पहुंचे, चारों तरफ बर्फ से ढकी पहाड़ियां, ठंडी हवा और शांत वातावरण… सब कुछ सपना जैसा लग रहा था।
लेकिन उस खूबसूरती के पीछे… कुछ और भी छुपा था।
शाम होते-होते उन्हें एहसास हुआ कि उनका hotel booking cancel हो चुका है।
"अब क्या करेंगे?" — कबीर ने फोन देखते हुए कहा।
तभी एक बूढ़ा आदमी उनके पास आया…
उसकी आंखें अजीब थीं… जैसे वो उन्हें पहचानता हो।
"अगर रहने की जगह चाहिए… तो पहाड़ी के उस पार एक पुराना villa है…" उसने धीमी आवाज में कहा।
"वो safe है?" — नील ने पूछा।
बूढ़ा कुछ सेकंड चुप रहा… फिर हल्का सा मुस्कुराया,
"रात गुजारने के लिए… काफी है।"
उसकी मुस्कान में कुछ था… जो डर पैदा कर रहा था।
चारों दोस्त उस villa की तरफ बढ़ने लगे।
रास्ता सुनसान था… पेड़ों के बीच अजीब सी खामोशी थी।
जैसे ही वो villa के पास पहुंचे… अचानक हवा तेज हो गई।
पुराना, टूटा हुआ… लेकिन अजीब तरह से खड़ा हुआ villa।
दरवाजा अपने आप थोड़ा सा खुला…
कर्कररररर…
"ये… अपने आप खुला?" — कबीर डरते हुए बोला।
आरव ने हिम्मत दिखाते हुए कहा,
"अरे हवा होगी… इतना भी क्या डरना।"
लेकिन कृष्णा वहीं खड़ा रह गया…
उसकी नजरें उस villa पर जमी थीं…
जैसे वो इस जगह को पहले से जानता हो।
अंदर जाते ही ठंड और बढ़ गई…
दीवारों पर पुराने फोटो लगे थे…
लेकिन उनमें चेहरों को खुरच कर मिटाया गया था।
"ये किसने किया होगा?" — नील ने धीरे से कहा।
तभी…
ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई…
ठक… ठक… ठक…
चारों ने एक साथ ऊपर देखा।
"यहां कोई और भी है…" — कबीर की आवाज कांप रही थी।
कृष्णा अचानक बोला…
"हमें यहां नहीं रुकना चाहिए…"
"अब क्या वापस जंगल में सोएंगे?" — आरव ने कहा।
कुछ सेकंड की चुप्पी…
फिर कृष्णा धीरे से बोला…
"तुम लोग नहीं समझोगे…"
उस रात उन्होंने वहीं रुकने का फैसला किया…
लेकिन किसी को नहीं पता था…
कि वो villa सिर्फ एक जगह नहीं था…
वो एक कहानी था… जो अधूरी रह गई थी…
और अब…
वो पूरी होने वाली थी।
(अध्याय 1 समाप्त)
अध्याय 2: पहली रात का सन्नाटा
रात धीरे-धीरे उस पुराने villa पर उतर चुकी थी…
बाहर बर्फ गिर रही थी… और अंदर… एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी।
चारों दोस्त अलग-अलग कमरों में रुकने का सोच रहे थे, लेकिन कबीर ने डरते हुए कहा,
"भाई… आज तो एक ही कमरे में सोते हैं… कुछ सही नहीं लग रहा।"
नील ने तुरंत हाँ में हाँ मिलाई,
"हाँ यार, ये जगह… थोड़ा ज्यादा ही creepy है।"
आरव हंसा,
"तुम दोनों तो ऐसे डर रहे हो जैसे कोई भूत सच में आ जाएगा!"
लेकिन फिर भी… सब एक ही कमरे में रुक गए।
कमरा पुराना था…
दीवारों पर दरारें थीं… छत से जाले लटक रहे थे… और एक कोने में रखा आईना… आधा टूटा हुआ था।
कृष्णा उस आईने को घूर रहा था…
जैसे उसमें कुछ देख रहा हो।
"क्या देख रहा है?" — आरव ने पूछा।
कृष्णा धीरे से बोला,
"तुम्हें… कुछ अजीब नहीं लग रहा?"
"नहीं तो…" — नील बोला।
कृष्णा ने फिर आईने की तरफ देखा…
एक पल के लिए…
उसे ऐसा लगा जैसे आईने में… चार नहीं… पाँच लोग खड़े हैं।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसने झट से पीछे मुड़कर देखा…
लेकिन वहां कोई नहीं था।
"कुछ नहीं… बस थकान है…" — उसने खुद को समझाया।
रात के करीब 12 बजे…
अचानक…
ठक… ठक… ठक…
दरवाजे पर दस्तक हुई।
सबकी नींद टूट गई।
"कौन है?" — आरव ने जोर से पूछा।
कोई जवाब नहीं…
बस फिर से…
ठक… ठक… ठक…
इस बार और धीमी… और भारी आवाज में।
कबीर डर गया,
"भाई मत खोलना… प्लीज मत खोलना…"
लेकिन आरव ने दरवाजा खोल दिया…
बाहर…
कोई नहीं था।
बस लंबा अंधेरा गलियारा…
और ठंडी हवा…
"देखा? कुछ नहीं है…" — आरव ने हंसते हुए कहा।
लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा बंद किया…
अंदर कमरे में…
एक चीज बदल चुकी थी।
वो टूटा हुआ आईना…
अब पूरा था।
"ये… ये पहले टूटा हुआ था ना?" — नील ने घबराते हुए कहा।
सबकी नजरें आईने पर टिक गईं।
धीरे-धीरे…
आईने में उनकी परछाइयां दिखने लगीं…
लेकिन…
उन परछाइयों के चेहरे…
मुस्कुरा नहीं रहे थे।
अचानक…
आईने में खड़ी परछाइयों में से एक ने…
अपना सिर टेढ़ा किया…
और धीरे से…
हाथ हिलाया।
कबीर चीख पड़ा,
"ये क्या था!!!"
सब पीछे हट गए।
कृष्णा की सांसें तेज हो गईं…
और उसकी आंखों में डर के साथ-साथ…
पहचान भी थी।
"ये वही है…" — कृष्णा बुदबुदाया।
"कौन वही?" — आरव ने गुस्से में पूछा।
कृष्णा चुप रहा…
जैसे वो कुछ बताना चाहता था… लेकिन डर रहा था।
तभी…
कमरे की लाइट अपने आप बंद हो गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
और उस अंधेरे में…
एक धीमी सी आवाज आई…
"तुम वापस आ गए… कृष्णा…"
तीनों दोस्त सन्न रह गए।
"इसने… तेरा नाम लिया…" — नील कांपते हुए बोला।
कृष्णा की आंखों से डर साफ दिख रहा था…
उसने धीरे से कहा…
"मैंने कहा था… हमें यहां नहीं आना चाहिए था…"
अचानक लाइट वापस आ गई…
आईना फिर से टूटा हुआ था…
और सब कुछ सामान्य लग रहा था।
लेकिन अब…
कुछ भी सामान्य नहीं था।
उस रात…
चारों दोस्त सो नहीं पाए…
क्योंकि उन्हें एहसास हो चुका था…
कि इस villa में…
कोई है…
जो उन्हें देख रहा है…
जो उन्हें जानता है…
और…
जो खास तौर पर…
कृष्णा का इंतजार कर रहा था।
(अध्याय 2 समाप्त)
अध्याय 3: परछाइयों का खेल
उस रात किसी की आंख नहीं लगी…
कमरे में चारों दोस्त चुप बैठे थे, लेकिन खामोशी अब शांत नहीं… डरावनी हो चुकी थी।
घड़ी की टिक-टिक भी अब किसी अनजान खतरे की गिनती जैसी लग रही थी।
"यार… ये सब क्या था?" — कबीर ने धीरे से पूछा।
कोई जवाब नहीं…
सबकी नजरें बार-बार उस टूटे हुए आईने पर जा रही थीं।
कृष्णा अचानक उठा…
"मैं देख कर आता हूँ… बाहर कोई है क्या…"
"पागल हो गया है क्या?" — नील ने उसका हाथ पकड़ लिया।
लेकिन कृष्णा ने धीरे से हाथ छुड़ाया…
"अगर हम डरते रहे… तो ये चीज हमें और डराएगी…"
उसकी आवाज में डर था… लेकिन साथ ही एक अजीब सा सच जानने का जुनून भी।
वो दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
गलियारा लंबा था… और अंधेरा उससे भी ज्यादा गहरा।
दीवारों पर लगी तस्वीरें अब पहले से ज्यादा डरावनी लग रही थीं…
क्योंकि…
अब उनमें कुछ और भी था।
जैसे ही कृष्णा एक तस्वीर के पास गया…
उसने देखा…
जिस चेहरे को पहले खुरचा गया था…
वो अब धीरे-धीरे वापस उभर रहा था।
आंखें…
पहले सिर्फ खाली जगह थी…
अब वहां गहरी, काली आंखें बन रही थीं…
जो सीधे कृष्णा को देख रही थीं।
कृष्णा पीछे हट गया…
उसकी सांसें तेज हो गईं।
तभी…
पीछे से एक फुसफुसाहट आई…
"तू मुझे भूल गया… कृष्णा…"
कृष्णा ने झट से पीछे देखा…
कोई नहीं।
लेकिन अब…
उसके पैरों के पास…
एक परछाई थी…
जो उसकी अपनी नहीं थी।
वो परछाई धीरे-धीरे लंबी होती जा रही थी…
और फिर…
उसने अपना हाथ उठाया…
कृष्णा जम गया।
उसका शरीर हिल नहीं रहा था…
जैसे कोई उसे पकड़कर खड़ा कर चुका हो।
तभी…
उसके कान के पास कोई बहुत पास आकर बोला…
"इस बार… मैं तुझे जाने नहीं दूंगी…"
कृष्णा जोर से चिल्लाया…
"कौन है तू!!!"
उसकी आवाज सुनकर बाकी तीनों दोस्त बाहर दौड़े।
"क्या हुआ??" — आरव ने पूछा।
कृष्णा कांपते हुए दीवार की तरफ इशारा कर रहा था…
लेकिन अब वहां…
कुछ भी नहीं था।
"वो यहीं थी… उसने मुझसे बात की…" — कृष्णा की आवाज टूट रही थी।
"कौन??" — कबीर ने डरते हुए पूछा।
कुछ सेकंड की चुप्पी…
फिर कृष्णा ने धीरे से कहा…
"वो… जो मर चुकी है…"
तीनों दोस्त सन्न रह गए।
"क्या मतलब??" — नील ने पूछा।
कृष्णा ने नजरें झुका लीं…
जैसे वो कोई बहुत बड़ा सच छुपा रहा हो।
तभी…
ऊपर से अचानक…
कुछ गिरने की तेज आवाज आई।
धड़ाम!!!
सब एक साथ ऊपर देखने लगे।
"वहाँ… कोई है…" — आरव बोला।
डर के बावजूद… चारों धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे।
जैसे ही वो ऊपर पहुंचे…
एक कमरा आधा खुला हुआ था।
अंदर से…
हल्की-हल्की सिसकियों की आवाज आ रही थी।
कबीर ने कांपते हुए कहा,
"मत खोलो… प्लीज मत खोलो…"
लेकिन इस बार…
दरवाजा अपने आप खुल गया।
कर्करररर…
अंदर…
कमरा खाली था।
लेकिन…
कमरे के बीचों-बीच…
एक पुरानी कुर्सी रखी थी…
जो धीरे-धीरे खुद ही हिल रही थी।
और उस कुर्सी के पीछे…
दीवार पर…
खून जैसे लाल निशानों से लिखा था—
"WELCOME BACK KRISHNA"
नील की आंखों से आंसू निकल पड़े,
"ये मजाक नहीं है… ये सच में कुछ गलत है…"
तभी…
कृष्णा धीरे-धीरे उस दीवार के पास गया…
और कांपते हुए बोला…
"मैं… वापस नहीं आना चाहता था…"
अचानक…
कमरे का दरवाजा जोर से बंद हो गया।
धड़ाम!!!
अंदर अंधेरा छा गया।
और उसी अंधेरे में…
एक लड़की की परछाई दिखाई दी…
लंबे बाल… झुका हुआ सिर…
और धीरे-धीरे उठती हुई आंखें…
वो सीधे कृष्णा की तरफ बढ़ रही थी…
बाकी तीनों दोस्त दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहे थे…
लेकिन दरवाजा खुल नहीं रहा था।
"कृष्णा!!! भाग!!!" — आरव चिल्लाया।
लेकिन कृष्णा वहीं खड़ा रहा…
जैसे वो भागना नहीं चाहता…
उस लड़की की आवाज गूंजी…
धीमी… लेकिन खौफनाक—
"इस बार… सच बताए बिना… कोई नहीं बचेगा…"
कृष्णा की आंखों से एक आंसू गिरा…
और उसने धीरे से कहा—
"मैंने उसे नहीं मारा था…"
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
और उसी पल…
कहानी ने एक नया मोड़ ले लिया…
(अध्याय 3 समाप्त)
अध्याय 4: दर्द की शुरुआत
कमरे का दरवाजा बंद था…
अंदर अंधेरा… और सामने खड़ी वो परछाई।
कृष्णा की सांसें तेज थीं… लेकिन इस बार वो भाग नहीं रहा था।
जैसे वो जानता था… अब बचना नहीं है।
बाहर…
आरव, कबीर और नील दरवाजा तोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
"खुल जा यार!!!" — आरव जोर-जोर से दरवाजा पीट रहा था।
तभी…
अचानक पूरा villa हिलने लगा…
जैसे अंदर कोई जाग गया हो।
नील अचानक चिल्लाया—
"आआआह!!!"
दोनों ने उसकी तरफ देखा…
नील जमीन पर गिर चुका था।
उसके हाथ पर… गहरे काले निशान बन रहे थे…
जैसे किसी ने उसे कसकर पकड़ रखा हो।
"कौन है!!! छोड़ उसे!!!" — कबीर डर के मारे चिल्लाया।
लेकिन वहां कोई नहीं था…
फिर भी…
नील हवा में खिंचने लगा…
धीरे-धीरे… घसीटते हुए…
गलियारे की तरफ।
"नील!!!" — आरव दौड़ा…
लेकिन जैसे ही उसने नील का हाथ पकड़ा…
उसे ऐसा लगा जैसे किसी बर्फ जैसी ठंडी चीज ने उसे छू लिया हो।
नील की आंखें उलटने लगीं…
और उसके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला—
"मत… छोड़ना…"
अचानक…
नील दीवार से जा टकराया…
और बेहोश हो गया।
अब डर… हकीकत बन चुका था।
इधर…
कमरे के अंदर…
वो लड़की धीरे-धीरे कृष्णा के बिल्कुल सामने आ चुकी थी।
उसका चेहरा अब साफ दिख रहा था…
आंखें पूरी काली…
होंठ फटे हुए…
और चेहरे पर एक दर्द… जो गुस्से में बदल चुका था।
"याद है…?" — उसने धीमी आवाज में पूछा।
कृष्णा की आंखों से आंसू गिरने लगे…
"मैं… भूलना चाहता था…"
लड़की की आवाज अचानक भारी हो गई—
"लेकिन मैं नहीं भूली…"
अचानक…
कृष्णा हवा में उठ गया…
जैसे कोई उसे गले से पकड़कर उठा रहा हो।
उसकी सांस रुकने लगी…
बाहर…
आरव और कबीर दरवाजा तोड़ने में लगे थे…
लेकिन तभी…
कबीर अचानक रुक गया।
उसकी नजर सामने दीवार पर गई…
जहां एक आईना था…
उस आईने में…
कबीर अकेला नहीं था।
उसके पीछे…
एक और चेहरा था…
जो धीरे-धीरे उसके कान के पास आ रहा था।
"तुम सब… दोषी हो…"
कबीर जम गया…
उसने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की…
लेकिन शरीर हिल नहीं रहा था।
अचानक…
उसका सिर खुद-ब-खुद आईने की तरफ झुक गया…
और…
धड़ाम!!!
उसका माथा आईने से टकराया।
आईना टूट गया…
और उसके माथे से खून की हल्की धार निकल आई।
आरव घबरा गया—
"कबीर!!! होश में आ!!!"
लेकिन कबीर की आंखें अब खाली थीं…
जैसे वो कहीं और देख रहा हो…
तभी…
पूरे villa में एक साथ आवाज गूंजी—
"चारों ने मिलकर… उसे अकेला छोड़ दिया था…"
आरव के चेहरे का रंग उड़ गया…
"क्या मतलब…?"
इधर…
कमरे के अंदर…
कृष्णा जमीन पर गिर चुका था…
लड़की उसके सामने झुक गई…
और बहुत करीब आकर बोली—
"तुम सबने मुझे उस रात… उस अंधेरे में छोड़ दिया…"
कृष्णा जोर से रो पड़ा—
"हम डर गए थे… हमें लगा तुम वापस आ जाओगी…"
लड़की की आवाज कांप रही थी…
लेकिन उसमें दर्द ज्यादा था—
"मैं वापस आई थी…"
"लेकिन तब तक… बहुत देर हो चुकी थी…"
अचानक…
कमरे की दीवारों पर एक-एक करके दृश्य दिखने लगे…
चार दोस्त…
एक लड़की के साथ…
हंसते हुए…
फिर…
रात…
जंगल…
और वो लड़की…
अकेली…
डरती हुई…
चिल्लाती हुई—
"कृष्णा… मुझे मत छोड़ो…"
लेकिन चारों दोस्त…
भाग रहे थे…
उसे पीछे छोड़कर।
वर्तमान में…
आरव के घुटने कांपने लगे…
"हमने… क्या किया था…"
तभी…
नील अचानक उठ बैठा…
लेकिन उसकी आंखें…
अब उसकी अपनी नहीं थीं।
वो धीरे-धीरे बोला—
"अब… वही दर्द तुम महसूस करोगे…"
और उसी पल…
पूरे villa की लाइट बंद हो गई।
चारों दोस्त…
अलग-अलग कोनों में…
अकेले खड़े थे…
हर किसी के सामने…
वो लड़की खड़ी थी।
और हर किसी के कान में एक ही आवाज गूंजी—
"तड़प क्या होती है… अब समझोगे…"
चीखें…
सिसकियां…
और डर…
पूरे villa में फैल गया।
उस रात…
किसी ने किसी को नहीं बचाया…
क्योंकि…
अब…
कोई भी बचने वाला नहीं था।
(अध्याय 4 समाप्त)
अध्याय 5: आखिरी सच (अंतिम अध्याय)
पूरे villa में सिर्फ चीखों की गूंज थी…
लेकिन कुछ मिनट बाद…
सब कुछ अचानक शांत हो गया।
अंधेरा… ठंड… और एक गहरा सन्नाटा।
धीरे-धीरे लाइट वापस आई…
सबसे पहले…
आरव ने आंखें खोलीं।
उसका शरीर कांप रहा था… सांसें तेज थीं…
उसने इधर-उधर देखा—
"कबीर… नील… कृष्णा…?"
कोई जवाब नहीं।
वो लड़खड़ाते हुए उठा…
और कमरे से बाहर निकला।
गलियारा अब पहले जैसा नहीं था…
दीवारों पर लगे सारे फोटो…
अब साफ थे।
उनमें वही चारों दोस्त थे…
और उनके साथ…
वो लड़की भी।
आरव की आंखें फटी रह गईं…
"ये… ये कब की फोटो है…?"
तभी…
पीछे से आवाज आई—
"जब हम पाँच थे…"
आरव धीरे-धीरे पीछे मुड़ा…
कृष्णा खड़ा था।
लेकिन…
वो पहले जैसा नहीं लग रहा था।
उसकी आंखें गहरी थीं…
चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
"कृष्णा… बाकी सब कहाँ हैं?" — आरव ने डरते हुए पूछा।
कृष्णा हल्का सा मुस्कुराया…
"यहीं हैं…"
आरव ने चारों तरफ देखा…
लेकिन कोई नहीं था।
"मुझे समझ नहीं आ रहा…"
कृष्णा धीरे-धीरे उसके पास आया…
और बोला—
"तुम्हें याद है… वो रात?"
आरव की आंखों में डर भर गया…
"हम… हम बस डर गए थे…"
कृष्णा की आवाज भारी हो गई—
"डर गए थे… या भाग गए थे?"
अचानक…
दीवार पर एक दृश्य उभरने लगा…
वो पाँचों दोस्त…
कश्मीर में…
हंसते हुए…
लड़की का नाम था—
"आन्या"
वो कृष्णा से बहुत प्यार करती थी…
और बाकी तीनों के लिए… एक अच्छी दोस्त थी।
लेकिन उस रात…
सब कुछ बदल गया।
जंगल में…
वो पाँचों घूमने गए थे…
अचानक…
आन्या कहीं फिसल गई…
और गहरी खाई के किनारे अटक गई।
वो चिल्ला रही थी—
"कृष्णा… मुझे बचाओ…"
कृष्णा उसे पकड़ने की कोशिश कर रहा था…
लेकिन…
बाकी तीनों डर गए।
"यार छोड़ दे… तू भी गिर जाएगा!" — आरव चिल्लाया।
"कोई नहीं देखेगा… चल यहां से…" — कबीर बोला।
कृष्णा कन्फ्यूज हो गया…
उसका हाथ कांप रहा था…
और फिर…
उसने…
उसका हाथ छोड़ दिया।
आन्या नीचे गिर गई…
उसकी आवाज…
धीरे-धीरे खत्म हो गई।
वर्तमान में…
आरव रो पड़ा—
"हमसे गलती हो गई…"
कृष्णा की आंखों से भी आंसू बहने लगे…
"गलती…?"
उसकी आवाज अब गूंज रही थी—
"तुम लोगों ने उसे मरने दिया…"
अचानक…
कबीर और नील भी सामने आ गए…
लेकिन अब वो इंसान नहीं लग रहे थे…
उनके चेहरे खाली थे…
आंखें गहरी…
आरव पीछे हट गया—
"ये… ये क्या हो रहा है…?"
कृष्णा धीरे से बोला—
"क्योंकि… हम उस रात ही मर गए थे…"
आरव जम गया।
"क्या…?"
कृष्णा आगे बढ़ा—
"जब आन्या गिरी… हम भागे…"
"लेकिन उसी रात… रास्ते में…"
दीवार पर एक और दृश्य दिखा—
चारों दोस्त…
गाड़ी में…
घबराए हुए…
फिर…
तेज मोड़…
और…
धड़ाम!!!
गाड़ी खाई में गिर गई।
आरव के हाथ कांपने लगे—
"मतलब… हम…"
कृष्णा ने धीरे से कहा—
"हम उसी रात मर गए थे…"
"और ये villa…"
"ये हमारी सजा है…"
अचानक…
वो लड़की…
आन्या…
उनके बीच खड़ी थी।
अब उसका चेहरा शांत था…
लेकिन आंखों में गहरा दर्द था।
"मैं अकेली नहीं थी…" — उसने धीरे से कहा।
"तुम सब भी मेरे साथ… उस अंधेरे में रहोगे…"
आरव रोने लगा—
"हमें माफ कर दो… प्लीज…"
कुछ सेकंड की चुप्पी…
फिर…
आन्या ने धीरे से कहा—
"माफी… तब मिलती है… जब कोई कोशिश करे…"
"तुम लोगों ने कोशिश भी नहीं की…"
अचानक…
पूरा villa फिर अंधेरे में डूब गया।
और उस अंधेरे में…
चारों की चीखें फिर से गूंज उठीं।
धीरे-धीरे…
सब कुछ खत्म हो गया।
अगली सुबह…
वही बूढ़ा आदमी फिर वहां खड़ा था…
कुछ नए लोग वहां आए…
रहने की जगह ढूंढते हुए।
वो बूढ़ा मुस्कुराया…
"अगर रहना है… तो उस villa में चले जाओ…"
और जैसे ही वो लोग वहां गए…
दरवाजा अपने आप खुल गया…
कर्करररर…
और अंदर…
दीवार पर अब एक नई फोटो लगी थी—
पाँच लोग…
चार दोस्त…
और बीच में…
आन्या।
सब मुस्कुरा रहे थे…
लेकिन…
उनकी आंखें…
अब भी…
जिंदा नहीं थीं।
(कहानी समाप्त)
